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एतिहासिक व पुराणिक स्थल: सिद्धि विनायक मंदिर

Written by News Bureau

सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वह भक्तों की मनोकामना को तुरंत पूरा करते हैं। मान्यता है कि गणपति जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं,  उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। सिद्धि विनायक की दूसरी विशेषता यह है कि उनके ऊपर के दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है और नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक से भरा कटोरा है।

गणपति के दोनों ओर उनकी पत्नियां रिद्धि और सिद्धि मौजूद हैं, जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक हैं।  सिद्धि विनायक का विग्रह ढाई फुट ऊंचा होता है और यह दो फुट चौड़े एक ही काले शिलाखंड से बना होता है। यूं तो सिद्घि विनायक के भक्त दुनिया के हर कोने में हैं,, लेकिन महाराष्ट्र में इनके भक्त सबसे ज्यादा हैं।

समृद्धि की नगरी मुंबई के प्रभा देवी इलाके का सिद्धि विनायक मंदिर उन गणेश मंदिरों में से एक है, जहां सिर्फ  हिंदू ही नहीं, बल्कि हर धर्म के लोग दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। हालांकि इस मंदिर की न तो महाराष्ट्र के अष्टविनायकों में गिनती होती है और न ही सिद्ध टेक से इसका कोई संबंध है, फिर भी यहां गणपति पूजा का खास महत्त्व है।

महाराष्ट्र में गणेशजी के आठ सिद्ध ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल हैं, जो अष्टविनायक के नाम से प्रसिद्ध हैं। आमतौर पर भक्तगण बायीं तरफ मुड़ी सूंड वाली गणेश प्रतिमा की ही प्रतिष्ठापना और पूजा-अर्चना किया करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि दाहिनी ओर मुड़ी गणेश प्रतिमाएं सिद्ध पीठ की होती हैं और मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर में गणेश जी की जो प्रतिमा है, वह दायीं ओर मुड़े सूंड वाली है।

यानी यह मंदिर भी सिद्ध पीठ है। किंवदंती है कि इस मंदिर का निर्माण संवत् 1692 में हुआ था।  सिद्धि विनायक मंदिर में हर मंगलवार को भारी संख्या में भक्तगण गणपति बप्पा के दर्शन कर अपनी अभिलाषा पूरी करते हैं। मंगलवार को यहां इतनी भीड़ होती है कि लाइन में चार-पांच घंटे खड़े होने के बाद दर्शन हो पाते हैं। हर साल गणपति पूजा महोत्सव पर यहां भाद्रपद की चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक विशेष समारोह श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

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