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सच्ची कहानी, “इबादत व बख्श”

Written by News Bureau

हजरत अबुल हसन खिरकानी दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी के एक बहुत महान सूफी संत हुए हैं। यह घटना उनके जीवन से संबंधित है। एक बार उनकी माता जी बीमार पड़ गईं। हजरत अबुल हसन खिरकानी साहब के एक छोटे भाई भी थे। वे भी परमात्मा के भक्त थे। दोनों भाइयों का अधिकतर समय इबादत में ही गुजरता था, लेकिन मां की सेवा और इबादत दोनों में ही व्यवधान न आए, इसके लिए दोनों भाइयों ने काम इस तरह बांट लिया कि एक भाई मां की सेवा में रहता तो दूसरा इबादत में।

दोनों भाई बारी-बारी से रात मां की सेवा और इबादत में बिताते। एक रात भाई की बारी मां की खिदमत करने की थी और हजरत अबुल हसन खिरकानी साहब की इबादत करने की। उस रात उनके छोटे भाई का मन हुआ कि वह रात परमात्मा की इबादत में गुजारें। उन्होंने हजरत अबुल हसन खिरकानी साहब से निवेदन किया कि आज रात आप मां की खिदमत करें, मैं आज की रात इबादत में बिताना चाहता हूं। हजरत अबुल हसन खिरकानी खुशी-खुशी अपने छोटे भाई की बात मान गए और अपनी मां की खिदमत में लग गए। उनके भाई इबादतखाने में चले गए और परमात्मा की इबादत करने लगे।

इबादत शुरू करते ही उन्हें एक दिव्य वाणी सुनाई दी, ‘हमने तेरे भाई को बख्शा (मोक्ष दिया) और उसके तुफैल में (हेतु) तुझे भी बख्शा।’ यह दिव्य वाणी सुनकर छोटे भाई को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे बोले ‘या अल्लाह! मैं तेरी इबादत में हूं। चाहिए तो यह था कि मेरा भाई मेरी इबादत के तुफैल में बख्शा जाता।’ आवाज आई ‘तू हमारी इबादत करता है, जिसकी हमे जरूरत नहीं और तेरा भाई मां की खिदमत में है, जिसकी उसे जरूरत है।’ इतना सुनना था कि छोटे भाई को समझ आ गया कि मां की सेवा भी अल्लाह की इबादत ही है।

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