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	<title>Bhuwan Chandra &#8211; Bless TV</title>
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	<title>Bhuwan Chandra &#8211; Bless TV</title>
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		<title>इच्छा की देवी माता कामाख्या । जानिये मंदिर की लोकप्रियता का मुख्य कारण ।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 Apr 2022 12:03:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[माता कामाख्या सभी भक्तों का कल्याण करें&#x1f490; माँ कामाख्या या कामेश्वरी को इच्छा की देवी कहा जाता है। कामाख्या देवी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तर पूर्व भारत में असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के पश्चिमी भाग में स्थित नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित है। मां कामाख्या देवालय को पृथ्वी पर 51 शक्ति-पीठों में सबसे पवित्र...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>माता कामाख्या सभी भक्तों का कल्याण करें<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
माँ कामाख्या या कामेश्वरी को इच्छा की देवी कहा जाता है। कामाख्या देवी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तर पूर्व भारत में असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के पश्चिमी भाग में स्थित नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित है। मां कामाख्या देवालय को पृथ्वी पर 51 शक्ति-पीठों में सबसे पवित्र और सबसे पुरातन माना जाता है। यह भारत में व्यापक रूप से प्रचलित तांत्रिक शक्तिवाद पंथ का केंद्रबिंदु है। मां कामाख्या देवी का मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि यह मंदिर देवी के रजस्वला की वजह से अधिक प्रसिद्ध है और लोगों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर में एक चट्टान के रूप में बनी योनि से रक्त का स्राव होता है जो इस मंदिर की लोकप्रियता का मुख्य कारण है।</p>
<p>कामाख्या देवी मंदिर का इतिहास –<br />
माना जाता है कि कामाख्या देवी मंदिर का निर्माण मध्यकाल के दौरान कराया गया था। कोच राजा बिस्व सिंघ ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1553-54 में कराया था। बाद में गौड़ के एक मुस्लिम आक्रमणकारी कालापहाड़ ने मंदिर को नष्ट करा दिया। इसके बाद राजा बिस्व सिंघ के उत्तराधिकारी महान कोच राजा नरनारायण ने अपने भाई चिलाराई के साथ इस स्थान का निरीक्षण किया और इसे पूरी तरह खंडहर में पाया।नारायण ने 1565 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और मंदिर को शाही संरक्षण दिया।17 वीं शताब्दी की शुरुआत में अहोम ने इस मंदिर का निर्माण कई तरह के पत्थरों से कराया जिसका प्रमाण मंदिर के शिलालेख और तांबे की प्लेट से मिलता है। 1897 ई. में भूकंप के कारण मुख्य मंदिर को बहुत नुकसान पहुँचा और कामाख्या के कुछ अन्य मंदिरों के गुंबद गिर गए। कोचबिहार का शाही दरबार बचाव में आया और मरम्मत के लिए मोटी रकम दान की। मंदिर की मरम्मत कई बार की गई। मंदिर को विभिन्न राजाओं का शाही संरक्षण प्राप्त हुआ।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-16313" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-300x200.jpg" alt="" width="577" height="384" srcset="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-300x200.jpg 300w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-1024x683.jpg 1024w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-768x512.jpg 768w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-600x400.jpg 600w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple.jpg 1200w" sizes="(max-width: 577px) 100vw, 577px" /></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सती ने अपना विवाह भगवान शंकर के साथ रचाया। लेकिन सती के विवाह से उनके पिता दक्ष प्रसन्न नहीं हुए। जब एक बार सती के पिता राजा दक्ष ने एक यज्ञ आयोजित किया तो इसमें उनके पति को नहीं बुलाया जिससे माता सती बिना बुलाए पिता के घर पहुंच गईं। वहां उनके पिता ने भगवान शंकर का अपमान किया। माता सती अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पायीं और हवन कुंड में कूद गईं। पता चलने पर भगवान शिव वहां पहुंचे और सती का शव लेकर तांडव करने लगे। जब उन्हें रोकने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र फेंका तो सती का शव 51 भागों में कटकर विभिन्न स्थानों पर जा गिरा। इसमें से माता सती की योनि और उनका गर्भ जिस स्थान पर गिरा वहीं पर एक मंदिर बनाया गया जिसे कामाख्या देवी मंदिर के नाम से जानते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-16312" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/download.jpg" alt="" width="526" height="337" /></p>
<p>कामाख्या देवी मंदिर के बारे में रोचक तथ्य:<br />
कामाख्या देवी का मंदिर भारत में स्थित अन्य देवियों के मंदिरों से काफी अलग है। यही एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां देवी का रजस्वला समाप्त होने के बाद श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए उमड़ते हैं।</p>
<p>आइये जानते हैं शक्तिपीठ कामाख्या देवी मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य।<br />
माँ कामाख्या का मंदिर दशमहाविद्याओं यानि देवताओं के दस अवतार त्रिपुरा सुंदरी, मातंगी,कमला,काली,तारा,भुवनेश्वरी,बगलामुखी, छिन्नमस्ता,भैरवी,धूमावती को समर्पित मंदिर हैं। यहां भगवान शिव के पांच मंदिर कामेश्वर, सिद्धेश्वर, केदारेश्वर, अमरत्सोस्वर, अघोर स्थित हैं। शक्तिपीठ मां कामाख्या के मंदिर में प्रसिद्ध अंबुबाची मेला लगता है जो चार दिनों तक चलता है। कामाख्या देवी मंदिर का अंबुबाची मेला बहुत ही लोकप्रिय है और यह मंदिर की कई विशेषताओं में से एक है। यह मंदिर कामाख्या देवी के मासिक धर्म के कारण प्रसिद्ध है। माना जाता है कि आषाढ़ महीने के सातवें दिन मां कामाख्या को माहवारी शुरू होती है और जब उनकी माहवारी खत्म होती है तो मेले में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर एक मील ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहां श्रद्धालु मां के जयकारे लगाते हुए पहुंचते हैं। कामाख्या देवी मंदिर में जब मेले का आयोजन किया जाता है तब देशभर के तांत्रिक इस मेले में भाग लेने पहुंचते हैं। मंदिर की एक अन्य विशेषता यह है कि जब मां कामाख्या रजस्वला होती हैं तो जलकुंड में पानी की जगह खून बहता है। कामाख्या देवी मंदिर की यह खासियत है कि जब तक देवी में रजस्वला होती हैं,तब तक मंदिर का कपाट बंद रहता है। मंदिर का कपाट बंद होने से पहले यहां एक सफेद कपड़ा बिछाया जाता है और जब कपाट खुलता है तो यह कपड़ा बिल्कुल लाल रहता है। इस लाल कपड़े को अंबुबाची मेले में आये श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मंदिर परिसर में योनि के आकार की एक समतल चट्टान है जिसकी पूजा की जाती है। कामाख्या देवी का मंदिर पशुओं की बलि देने के लिए भी प्रसिद्ध् है लेकिन एक खासियत यह भी है कि यहां मादा पशुओं की बलि नहीं दी जाती है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-16314" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-300x225.jpg" alt="" width="513" height="385" srcset="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-300x225.jpg 300w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-768x576.jpg 768w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-370x278.jpg 370w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi.jpg 1024w" sizes="(max-width: 513px) 100vw, 513px" /></p>
<p>कामाख्या देवी मंदिर में पूजा का समय –<br />
सुबह साढ़े पांच बजे कामाख्या देवी को स्नान कराया जाता है और छह बजे नित्य पूजा होती है। इसके बाद सुबह आठ बजे मंदिर का कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है। दोपहर एक बजे मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है और देवी को भोग लगाकर प्रसाद श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। दोपहर ढाई बजे मंदिर का कपाट दोबारा से भक्तों के लिए खोला जाता है और रात साढ़े सात बजे कामाख्या देवी की आरती के बाद मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है।</p>
<p>माँ कामाख्या देवी बीज मंत्र –<br />
&#8220;क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः&#8221;<br />
|| त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये<br />
प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूँ हूँ त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा ||</p>
<p>माँ कामाख्या देवी प्रणाम मंत्र –<br />
कामाख्ये कामसम्पन्ने कामेश्वरि हरप्रिये।<br />
कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते॥<br />
समस्त चराचर प्राणियों एवं सकल विश्व<br />
का कल्याण करो माता कामाख्या भवानी<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
जयति सनातन<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
जयतु भारतं<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
सदा सर्वदासुमंगल<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
हर हर महादेव<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
ॐ नमश्चण्डिकायै<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
जयभवानी</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर</title>
		<link>https://blesstvlive.com/difference-between-rishi-muni-sadhu-and-sanyasi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Apr 2022 12:13:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?</p>
<p>ऋषि कौन होते हैं</p>
<p>भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं।</p>
<p>ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है &#8220;ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है।</p>
<p>ऋषि शब्द का अर्थ</p>
<p>ऋषि शब्द &#8220;ऋष&#8221; मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।</p>
<p>ऋषियों के प्रकार</p>
<p>ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि।</p>
<p>सप्त ऋषि</p>
<p>पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है।</p>
<p>मुनि किसे कहते हैं</p>
<p>मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं।</p>
<p>मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि।</p>
<p>मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।</p>
<p>जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं।</p>
<p>मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-16288" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/sadhu-300x169.jpeg" alt="" width="693" height="391" srcset="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/sadhu-300x169.jpeg 300w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/sadhu.jpeg 720w" sizes="auto, (max-width: 693px) 100vw, 693px" /></p>
<p>साधु कौन होते हैं</p>
<p>किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया।</p>
<p>कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि &#8220;साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है।</p>
<p>साधु के लिए यह भी कहा गया है &#8220;आत्मदशा साधे &#8221; अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं।</p>
<p>संन्यासी किसे कहते हैं</p>
<p>सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है।</p>
<p>सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है।</p>
<p>हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है</p>
<p>परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे।</p>
<p>परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है।</p>
<p>यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।</p>
<p>वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है।</p>
<p>उपसंहार</p>
<p>ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।</p>
<p>।।जय श्री राम।।<br />
।जय महाकाल।।<br />
जयतु भारत <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f6a9.png" alt="🚩" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /></p>
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		<title>आज है मौनी अमावस्या, जानिए स्नान-दान का विशेष महत्&#x200d;व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Feb 2022 12:45:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शास्त्रों में कार्तिक मास के समान ही माघ मास को पवित्र माना जाता है। इस महीने में पड़ने वाली अमावस्या को माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या शनिदेव व पितरों से संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन ही मनु ऋषि का जन्म हुआ था...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्रों में कार्तिक मास के समान ही माघ मास को पवित्र माना जाता है। इस महीने में पड़ने वाली अमावस्या को माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या कहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या शनिदेव व पितरों से संबंधित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन ही मनु ऋषि का जन्म हुआ था और मनु शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई। इसलिए मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत रखने से मुनि पद की प्राप्ति होती है।</p>
<p>मौनी अमावस्या पर स्&#x200d;नान का विशेष महत्&#x200d;व होता है। इस दिन स्&#x200d;नान-दान से महापुण्&#x200d;य की प्राप्ति होती है। इस बार मौनी अमावस्या 01 फरवरी 2022, दिन मंगलवार को है।इस दिन तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने की परंपरा है।</p>
<p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन संगम पर सभी देवी-देवताओं का वास होता है, इसलिए इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने निरोगी काया की प्राप्ति होती है और मोक्ष मिलने की मान्यता है। अगर नहीं जा सकते तो घर में नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्&#x200d;नान करें।</p>
<p>इस साल मौनी अमावस्या पर धनु राशि में सूर्य, मंगल और शुक्र का गोचर होगा। मकर राशि में चंद्रमा, शनि और सूर्य देव संचरण करेंगे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, मौनी अमावस्या पर  27 साल बाद मकर राशि में शनि देव और सूर्य देव गोचर करेंगे।</p>
<p>मौनी अमावस्&#x200d;या पर क्&#x200d;या करें-क्&#x200d;या ना करें<br />
क्&#x200d;या ना करें</p>
<p>नहाते समय कुछ न बोलें, मौन रहें।<br />
घर में कलह ना होने दें. विवादों से बचें।<br />
शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए।<br />
सुबह देर तक नहीं सोना चाहिए. बिना नहाएं भोजन ना करें।<br />
नॉनवेज ना खाएं।</p>
<p>क्&#x200d;या करें<br />
पवित्र नदी में स्&#x200d;नान करना चाहिए।<br />
स्&#x200d;नान कर तिल, तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, कपड़े आदि का दान करें।<br />
संभव हो साधु, महात्मा, ब्राह्मणों को भोजन कराएं. यथाशक्ति दान दें।<br />
दान के अलावा इस दिन पितृ श्राद्ध किया जाता है।<br />
पहले जल को सिर पर लगाएं फिर स्&#x200d;नान करें।<br />
इस दिन व्रत रखते हैं तो फल और पानी ग्रहण किए जा सकते हैं।</p>
<p>मौनी अमावस्या पर इन चीजों का करें दान</p>
<p>मौनी अमावस्या को तिल, तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, वस्त्र आदि दान करने की परंपरा है. जरूरतमंदों को कम्बल, सर्दी के वस्त्र आदि दान करने चाहिए।</p>
<p><img decoding="async" src="https://static.india.com/wp-content/uploads/2022/01/mauni-amavasya.jpg" alt="Mauni Amavasya 2022: मौनी अमावस्&#x200d;या आज, भूलकर भी न करें ये काम" /></p>
<p><img decoding="async" src="https://images.news18.com/ibnkhabar/uploads/2021/01/kumbh-mela-2.jpg" alt="Mauni Amavasya 2021 mahasanyoga on mauni amavasya know vrat vidhi pur –  News18 हिंदी" /></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<item>
		<title>गिलोय &#8211; आयुर्वेद में &#8216;दिव्य&#8217; मानी जाती है यह औषधि, कोरोना के इस दौर में लाभदायक</title>
		<link>https://blesstvlive.com/giloy-this-medicine-is-considered-divine-in-ayurveda-beneficial-in-this-era-of-corona/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Jan 2022 10:41:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Bless]]></category>
		<category><![CDATA[Health]]></category>
		<category><![CDATA[AYURDEVA]]></category>
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					<description><![CDATA[आयुर्वेद, दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। इसमें प्रयोग में लाई जाने वाली कई जड़ी-बूटियों को बेहद कारगर माना जाता है, जो कि तमाम तरह की बीमारियों के जोखिम को कम करने में लाभदायक हो सकती है। कोरोना के इस दौर में दुनियाभर में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति काफी चर्चा में है।...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>आयुर्वेद, दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। इसमें प्रयोग में लाई जाने वाली कई जड़ी-बूटियों को बेहद कारगर माना जाता है, जो कि तमाम तरह की बीमारियों के जोखिम को कम करने में लाभदायक हो सकती है। कोरोना के इस दौर में दुनियाभर में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति काफी चर्चा में है। माना जाता रहा है कि कई जड़ी-बूटियों का नियमित रूप से सेवन करने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है, साथ ही कई प्रकार के रोगों और संक्रमण से शरीर की रक्षा हो सकती है। गिलोय ऐसी ही एक औषधि है जिसे कोरोना के इस दौर में सबसे ज्यादा प्रयोग में लाया जा रहा है।</p>
<p>आयुर्वेद विशेषज्ञों के मुताबिक दैनिक रूप से गिलोय का सेवन करने वाले लोगों की इम्युनिटी काफी मजबूत रहती है, साथ ही उन्हें तमाम तरह के संक्रमण और बीमारियों का खतरा भी कम होता है। एंटीऑक्सिडेंट, फाइबर और प्रोटीन के साथ-साथ टेरपेनोइड्स, अल्कलॉइड्स, लिग्नान जैसे यौगिकों के समूह वाले गिलोय के सेवन से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ हो सकते हैं। आइए गिलोय से सेहत को होने वाले ऐसे ही कुछ फायदों के बारे में जानते हैं।</p>
<p><strong>इम्युनिटी बढ़ाने वाली औषधि</strong><br />
आयुर्वेद विशेषज्ञों के मुताबिक गिलोय या गुडुची उन जड़ी-बूटियों में से है जिसे प्रतिरक्षा में सुधार करने में सबसे कारगर माना जाता है। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि कोरोना से पीड़ित लोगों ने भी गिलोय का सेवन करके स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया।  गिलोय एक प्राकृतिक एंटी-इंफ्लामेटरी, एंटी-बायोटिक, एंटी-एजिंग, एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-वायरल, एंटी-डायबिटिक और एंटी-कैंसर दवा है। शरीर की इम्युनिटी को बढ़ावा देने में गिलोय को बेहद कारगर माना जाता है।</p>
<p><strong>पाचन तंत्र के लिए बेहद फायदेमंद</strong><br />
विशेषज्ञों के मुताबिक पाचन में सुधार और आंत से संबंधी समस्याओं के इलाज में गिलोय बहुत फायदेमंद है। इसमें फाइबर की मात्रा पाई जाती है जो मल त्याग की प्रक्रिया को आसान बनाने के साथ पाचन को ठीक रखने में सहायक है। गिलोय का नियमित रूप से संयमित मात्रा में सेवन करना पाचन के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है।</p>
<p><strong>डायबिटीज रोगियों के लिए लाभदायक</strong><br />
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक जिन लोगों को डायबिटीज की समस्या है, उन्हें नियमित रूप से गिलोय का सेवन करने से लाभ मिल सकता है। गिलोय एक हाइपोग्लाइकेमिक एजेंट के रूप में कार्य करता है और मधुमेह (विशेष रूप से टाइप 2 मधुमेह) के इलाज में मदद कर सकता है।  गिलोय का रस उच्च रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में अद्भुत रूप से काम करता है।</p>
<p><strong>तनाव और चिंता को कम करने में सहायक</strong><br />
गिलोय को एडाप्टोजेनिक जड़ी बूटी के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। यह मानसिक तनाव के साथ-साथ चिंता को कम करने में मदद करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने, याददाश्त को बढ़ाने, मन को शांत करने में यह औषधि उत्कृष्ट रूप से काम करती है। गिलोय का सेवन करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष लाभदायक हो सकता है।</p>
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<hr />
<p>&nbsp;</p>
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		<title>उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर &#8211; जहाँ पर है स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी शिवलिंग</title>
		<link>https://blesstvlive.com/mahakaleshwar-temple-of-ujjain-where-is-the-self-styled-grand-and-south-facing-shivling/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Jan 2022 10:03:49 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Hindu]]></category>
		<category><![CDATA[Religion]]></category>
		<category><![CDATA[makaleshwar tample]]></category>
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					<description><![CDATA[महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। १२३५ ई. में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया, इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है। मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग स्थापित है। मंदिर का क्षेत्रफल १०.७७ x १०.७७ वर्गमीटर और ऊंचाई २८.७१ मीटर है। महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन १९६८ के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था। लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा १९८० के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है। हाल ही में इसके ११८ शिखरों पर १६ किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है। अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="" src="https://www.jansatta.com/wp-content/uploads/2020/09/Mahakaal-Mandir-Ujjain.jpg" alt="महाकाल मंदिर में भक्तों के शिवलिंग मलने पर रोक, पर सीमित मात्रा में अर्पित  कर सकेंगे शुद्ध दूध- SC का आदेश - Jansatta" width="579" height="375" /></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="" src="https://images.hindustantimes.com/img/2021/07/27/1600x900/a047eb44-ea47-11eb-a58e-c31d3a12ae0d_1626888040030_1627362083581.jpg" alt="Stampede at Ujjain&#039;s Mahakaleshwar temple, many hurt; virus norms go for a  toss | Latest News India - Hindustan Times" width="748" height="421" /></p>
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