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	<title>Temple &#8211; Bless TV</title>
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	<title>Temple &#8211; Bless TV</title>
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		<title>औरंगाबाद में महादेव का मंदिर बनने में करीब 100 साल लगे।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 28 Dec 2022 03:36:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुंबई, 28 दिसंबर: आज हम आपको एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। कहा जाता है कि इस मंदिर को बनने में 100 साल से भी ज्यादा का समय लगा था। यह मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा यानी वेरूल की गुफाओं में...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुंबई, 28 दिसंबर:</strong> आज हम आपको एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। कहा जाता है कि इस मंदिर को बनने में 100 साल से भी ज्यादा का समय लगा था। यह मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा यानी वेरूल की गुफाओं में स्थित है।</p>
<p>इसे वेरुल के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर के रूप में जाना जाता है। 276 फीट लंबा और 154 फीट चौड़ा यह मंदिर इस मायने में अनूठा है कि इसे केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। ऊंचाई की बात करें तो यह मंदिर किसी चार या पांच मंजिला इमारत के बराबर है।</p>
<p>कहा जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में करीब 40 हजार टन वजनी पत्थरों को काटा गया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसे हिमालयी कैलास जैसा बनाने की कोशिश की जा रही है। कहा जाता है कि इसे बनवाने वाले राजा का मानना ​​था कि अगर कोई हिमालय तक नहीं पहुंच सकता है तो उसे यहां आकर अपने आराध्य भगवान शिव के दर्शन करने चाहिए।</p>
<p>इस मंदिर का निर्माण मालखेड़ में राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (757-783) ने शुरू कराया था। माना जाता है कि इस मंदिर को बनने में 100 साल से भी ज्यादा का समय लगा था और करीब 7000 मजदूरों ने इस मंदिर के निर्माण में दिन-रात योगदान दिया था। यूनेस्को ने इस जगह को 1983 में ही &#8216;वर्ल्ड हेरिटेज साइट&#8217; घोषित कर दिया है।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>शनिवार के दिन मंदिर से जूते-चप्पल चोरी होना माना जाता है, जानिए इसका क्या मतलब है</title>
		<link>https://blesstvlive.com/shoes-and-slippers-are-believed-to-be-stolen-from-the-temple-on-saturday/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 Jul 2022 05:59:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हिंदू धर्म में कई मान्यताएं हैं, जिन्हें कुछ लोग केवल अंधविश्वास मानते हैं, लेकिन ज्योतिष के अनुसार ये मान्यताएं प्राचीन काल से ही मानव जीवन को प्रभावित करती रही हैं। इन्हीं में से एक मिथक है मंदिरों से जूते-चप्पल की चोरी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंदिर से जूते-चप्पल चोरी करना शुभ माना जाता है। हमारे...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में कई मान्यताएं हैं, जिन्हें कुछ लोग केवल अंधविश्वास मानते हैं, लेकिन ज्योतिष के अनुसार ये मान्यताएं प्राचीन काल से ही मानव जीवन को प्रभावित करती रही हैं। इन्हीं में से एक मिथक है मंदिरों से जूते-चप्पल की चोरी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंदिर से जूते-चप्पल चोरी करना शुभ माना जाता है। हमारे परिवार के वृद्ध लोग इन मान्यताओं को मानते हैं। माना जाता है कि शनिवार के दिन अगर आपके जूते-चप्पल मंदिर से चोरी हो जाते हैं तो यह आपके लिए शुभ हो सकता है।</p>
<p>बुरे वक्त का अंत<br />
ज्योतिष शास्त्र कहता है कि यदि शनिवार के दिन किसी मंदिर से आपका जूता या चंदन चोरी हो जाए तो यह आपके लिए बहुत ही शुभ है। शनिवार के दिन किसी मंदिर से जूते-चप्पल चोरी होने का मतलब है कि आपका बुरा समय जल्द खत्म होगा और आपके जीवन में सुख-समृद्धि आएगी। चोरी की चप्पल या जूता भी आपकी सभी समस्याओं को अपने साथ ले जाने के लिए कहा जाता है।</p>
<p>पैरों में शनि की गंध<br />
ज्योतिष शास्त्र में ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति के चरणों में शनिदेव का वास होता है। जैसे शनि पैरों से जुड़ा है, जूते और चप्पल भी शनि के कारक बनते हैं, इसलिए ऐसा माना जाता है कि अगर किसी के जूते और चप्पल चोरी या दान कर दिए जाते हैं, तो शनि की कृपा आप पर बनी रहती है और वे खुश रहते हैं। यह आपको आशीर्वाद भी देता है।</p>
<p>परेशानियां दूर होंगी<br />
ज्योतिष शास्त्र में यह माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ स्थिति में हो और अच्छे परिणाम न दे तो व्यक्ति को अपने कार्य में सफलता नहीं मिलती है। ऐसे में अगर शनिवार के दिन मंदिर से आपके जूते-चप्पल चोरी हो जाए तो यह आपके लिए शुभ है। शनिवार के दिन जूते-चप्पल चोरी करना या दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इससे आपके कष्ट जल्दी दूर होते हैं और शनिदेव प्रसन्न होते हैं।</p>
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		<item>
		<title>महामाया मंदिर के बारे में यह &#8216;रहस्य&#8217; आपको जगा देगा, आज भी पर्यटक उत्सुकता से आते हैं, लेकिन</title>
		<link>https://blesstvlive.com/this-mystery-about-mahamaya-temple-will-wake-you-up/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Feb 2022 13:14:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Hindu]]></category>
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					<description><![CDATA[भारत में कई रहस्यमय, अनोखे और चमत्कारी मंदिर हैं। इनमें से कुछ मंदिरों का रहस्य आज भी रहस्य बना हुआ है। इन्हीं में से एक है झारखंड राज्य के गुमान जिले के हापमुनि नामक गांव में स्थित महामाया मंदिर। इस मंदिर में मूल मूर्ति अभी भी बॉक्स में है। बाहर इस देवी की छवि है।...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में कई रहस्यमय, अनोखे और चमत्कारी मंदिर हैं। इनमें से कुछ मंदिरों का रहस्य आज भी रहस्य बना हुआ है। इन्हीं में से एक है झारखंड राज्य के गुमान जिले के हापमुनि नामक गांव में स्थित महामाया मंदिर। इस मंदिर में मूल मूर्ति अभी भी बॉक्स में है। बाहर इस देवी की छवि है। यहां अमावस्या डोलजात्रा है। उस समय बक्स को डोले के मंच पर लाया जाता है और मुख्य पुजारी उस बक्से को खोलकर माता की पूजा करते हैं। यह पूजा आंखों पर पट्टी बांधकर की जाती है। क्योंकि कहा जाता है कि इस मूर्ति को नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता है।</p>
<p>इस मूर्ति के प्रतीक के रूप में मंदिर में एक और मूर्ति स्थापित की गई है। इस मंदिर के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर में पूजा करते समय कुछ बाहरी लोगों ने बड़जुराम नाम के एक पुजारी पर हमला किया और उसकी पत्नी और बच्चों को मार डाला। जब बरजू को इस बात का अहसास हुआ, तो महामाया प्रकट हुईं और कहा कि तुम अकेले ही आक्रमणकारियों से लड़ सकते हो, बस पीछे मत देखो, अन्यथा तुम्हारा सिर कट जाएगा।</p>
<p>बरजू लड़े लेकिन जब उन्होंने जीत देखी तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और उनका सिर गिर गया। उनकी समाधि वहीं है जहां उनकी मृत्यु हुई थी। इस मंदिर में देवी-देवताओं की कई मूर्तियां हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर 1100 साल पुराना है। उस समय यहां एक साधु आए थे। बहुत कम बोलने के कारण उन्हें हप्पा मुनि कहा जाता था। हप्पा का अर्थ है चुप रहना। उसी से गांव का नाम पड़ा, अब यह हापमुनि हो गया है। यह भी माना जाता है कि यहां भूतों के खेत हैं।</p>
<p>भूत पालन के कारण यहां तांत्रिक पूजा की शुरुआत हुई थी। उस समय अपराधियों को इस मंदिर में आकर शपथ लेने के लिए कहा गया था। जिसने अपराध किया उसने डर के मारे मंदिर जाने से पहले अपना जुर्म कबूल कर लिया। उस समय इस प्रकार की पहचान थी लेकिन अब यह प्रथा पिछड़ गई है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>मंदिर पर झंडा क्यों फहराया जाता है? घर पर स्थापित करने के नियम जानें</title>
		<link>https://blesstvlive.com/why-is-the-flag-hoisted-over-the-temple-learn-the-rules-for-installing-at-home/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 05 Feb 2022 10:03:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हिंदू धर्म में, देवी-देवताओं के नाम पर मंदिरों में झंडे फहराए जाते हैं। आपने देखा होगा कि महाभारत में भगवान हनुमान स्वयं अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में विराजमान थे। आज भी लोग अक्सर अपनी पूजा के अनुसार पवित्र ध्वज को अपने वाहन में ले जाते हैं। तो लोग मंदिरों में अपनी मनोकामना...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में, देवी-देवताओं के नाम पर मंदिरों में झंडे फहराए जाते हैं। आपने देखा होगा कि महाभारत में भगवान हनुमान स्वयं अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में विराजमान थे। आज भी लोग अक्सर अपनी पूजा के अनुसार पवित्र ध्वज को अपने वाहन में ले जाते हैं। तो लोग मंदिरों में अपनी मनोकामना पूरी करने की क्षमता के अनुसार छोटे या बड़े झंडे चढ़ाने आते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह पवित्र झंडा किसी मंदिर या घर में क्यों फहराया जाता है? इस ध्वज को फहराने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? आइए जानते हैं ध्वज से जुड़े धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व के बारे में।</p>
<p>कैसे शुरू हुई ध्वजारोहण की परंपरा</p>
<p>ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में जब देवताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था, सभी देवताओं ने अपने प्रतीकों को अपने रथों पर रखा, जो अंततः उनका ध्वज बन गया। माना जाता है कि मंदिरों, वाहनों आदि में इस ध्वज को फहराने की परंपरा तभी से शुरू हुई थी। मंदिरों में फहराए गए झंडों के पीछे ऐसी मान्यता है कि यह न केवल मंदिर बल्कि पूरे शहर की रक्षा करता है।</p>
<p>झंडा फहराने की सही दिशा</p>
<p>सनातन परंपरा में धजा को संस्कृति, विजय और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक समारोहों में धार्मिक झंडों को फहराने के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं। उदाहरण के लिए यदि यह ध्वज घर में लगाना है तो इसे हमेशा घर के उत्तर-पश्चिम कोने में रखना चाहिए। उत्तर-पश्चिम कोने में स्थित धर्म ध्वज को बहुत ही शुभ और शुभ माना जाता है।</p>
<p>घर पर झंडा कैसे फहराएं</p>
<p>हर कोई अपने घर में अपने आराध्य देवता का झंडा फहरा सकता है, लेकिन ज्योतिष के अनुसार घर की छत पर स्वस्तिक या ओम लिखा हुआ त्रिकोणीय नारंगी झंडा फहराना शुभ होता है। ऐसा माना जाता है कि नारंगी झंडे में उगते सूरज की किरणें होती हैं, जो अंधेरे का नाश करती हैं और न केवल दुनिया में बल्कि व्यक्ति के जीवन में भी रोशनी फैलाने का काम करती हैं।</p>
<p>देवी-देवताओं से संबंधित झंडे</p>
<p>हिंदू धर्म में, प्रत्येक देवता से जुड़ा झंडा उनके वाहन का प्रतीक है। जैसे विष्णुजी के ध्वज पर चील, शिवाजी के ध्वज पर वृषभ, ब्रह्माजी के ध्वज पर कमल का चिन्ह, गणपति के ध्वज पर चूहा, सूर्यनारायण के ध्वज पर व्योम, कार्तिकेय के ध्वज पर मोर, कामदेव के ध्वज पर मकर राशि का चिन्ह।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>इस मंदिर में हुआ था शिव-पार्वती का विवाह</title>
		<link>https://blesstvlive.com/triyugi-narayan-temple-uttrakhand/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:35:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उत्तराखंड: रुद्रप्रयाग में स्थित &#8216;त्रियुगी नारायण&#8217; एक पवित्र जगह है, माना जाता है कि सतयुग में जब भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था तब यह ‘हिमवत’ की राजधानी था. इस जगह पर आज भी हर साल देश भर से लोग संतान प्राप्ति के लिए इकट्ठा होते हैं और हर साल सितंबर महीने में...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p class="gmail-secArticleTitle">उत्तराखंड: रुद्रप्रयाग में स्थित &#8216;त्रियुगी नारायण&#8217; एक पवित्र जगह है, माना जाता है कि सतयुग में जब भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था तब यह ‘हिमवत’ की राजधानी था. इस जगह पर आज भी हर साल देश भर से लोग संतान प्राप्ति के लिए इकट्ठा होते हैं और हर साल सितंबर महीने में बावन द्वादशी के दिन यहां पर मेले का आयोजन किया जाता है.</p>
<div>
<div class="gmail_signature" data-smartmail="gmail_signature">
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<p style="text-align: center;"><b>आज भी प्रज्वलित है विवाह मंडप की अग्नि</b></p>
<figure id="attachment_778" aria-describedby="caption-attachment-778" style="width: 300px" class="wp-caption aligncenter"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-778" src="http://blesstvlive.com/storage/2018/06/shiv-agni-300x169.jpg" alt="" width="300" height="169" /><figcaption id="caption-attachment-778" class="wp-caption-text">यह अग्नि आज भी निरंतर जल रही है.</figcaption></figure>
<p>मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए त्रियुगीनारायण मंदिर से आगे गौरी कुंड कहे जाने वाले स्थान माता पार्वती ने तपस्या की थी जिसके बाद भगवान शिव ने इसी मंदिर में मां से विवाह किया था. कहते हैं कि उस हवन कुंड में आज भी वही अग्नि जल रही है</p>
<p dir="ltr"><i>संतान प्राप्ति के लिए इस अग्नि का आशीर्वाद लेने के लिए देश के हर हिस्से से लोग आते हैं. ऐसी मान्यता है कि भगवान केदारनाथ की यात्रा से पहले यहां दर्शन करने से ही प्रभु प्रसन्न होते हैं. </i></p>
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		<title>इस मंदिर में शिव भोले हर साल देते हैं दर्शन &#124;</title>
		<link>https://blesstvlive.com/drone-shiv-mandir-gagret/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:31:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[﻿ यह है वो मंदिर यहाँ शिव भोले हर साल देते हैं वैसाखी से अगले शनिवार दर्शन! SHIVBADI AKA Drone Shiv Mandir (Temple) is located in village Ambota near Gagret (17 Kms away from the temple Chintapurni Mandir, Una, Himachal Pardesh. This temple is about 5000 years old. Devotees believe that Lord Shiva visit here...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><iframe src="https://www.youtube.com/embed/RIHubt80SYE" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"><span data-mce-type="bookmark" style="display: inline-block; width: 0px; overflow: hidden; line-height: 0;" class="mce_SELRES_start">﻿</span></iframe></p>
<p>यह है वो मंदिर यहाँ शिव भोले हर साल देते हैं वैसाखी से अगले शनिवार दर्शन!</p>
<p><strong>SHIVBADI AKA Drone Shiv Mandir</strong> (Temple) is located in village Ambota near Gagret (17 Kms away from the temple Chintapurni Mandir, Una, Himachal Pardesh.</p>
<p>This temple is about 5000 years old. Devotees believe that Lord Shiva visit here every year. The temple is said to have a rich history behind from the times of Guru Drone (Drona or Dronacharya).</p>
<p>The temple and the dense forest of special spiral branch trees around. It is once said to be the Drone Nagri (VILLAGE OF DRONACHARYA). He was the Guru of royal families, Pandavas and Kauravas.</p>
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		<item>
		<title>उलटे शिवलिंग वाला दुर्लभ शिव मंदिर</title>
		<link>https://blesstvlive.com/rare-shiva-temple/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:26:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[The Rare Shiva Temple भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर जहाँ शिवलिंग उल्टा स्थापित है। कहा जाता है कि दुनिया भर में इस मंदिर के इलावा एक ही एक और मंदिर है जहाँ शिवलिंग उल्टा स्थापित है&#124; यह दुर्लभ मंदिर स्थित है पंजाब के शहर फगवाड़ा में&#124; इसी तरह का उलटे शिवलिंग वाला दूसरा भगवान...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/pkT5SwuvNHM" frameborder="0" allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen></iframe></p>
<p>The Rare Shiva Temple</p>
<p>भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर जहाँ शिवलिंग उल्टा स्थापित है। कहा  जाता है कि दुनिया भर में इस मंदिर के इलावा एक ही एक और मंदिर है जहाँ शिवलिंग उल्टा स्थापित है| </p>
<p>यह दुर्लभ मंदिर स्थित है पंजाब के शहर फगवाड़ा में| इसी तरह का उलटे शिवलिंग वाला दूसरा भगवान शिव का मन्दिर हिमाचल प्रदेश में स्थित है, महादेव कलेश्वर। </p>
<p>फगवाड़ा के इस शिव मंदिर में प्रतिदिन हजारो कि सख्या में श्रदालु भोलेनाथ कें चरणो में शीश निवानेे आते है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि लगातर 40 दिन इस मन्दिर में नमन करने से भक्तो की मनोकामनाए पूर्ण होती है।</p>
<p>इस मंदिर का इतिहास शाहूकार पोलो मल महाराज से संबंधित बताया जाता है। पांच सौ साल पुराने इस मन्दिर में भगवान शिव का जो स्वरूप प्रतिष्टि है, वह पोलो मल कि कोशिशों द्वारा स्थापित किया गया था | 15 वी शताब्दी में इस शिवलिगं को काशी और काश्मीरी पंडितो ने पूरण मर्यादा सहित स्थापित किया था| </p>
<p>कहा जाता है कि कारीगर को यह बात बताई ना गई कि शिवलिगं को किस प्रकार स्थापित करना है और कारीगर ने अपनी समझ के अनुसार शिवलिगं को उल्टा लगा दिया | पडितो के कहने पर कारीगरो को इस शिवलिगं को सीधा करने के लिए कहा गया, परन्तु वो इसे हिला भी न सके | स्थानीय भगतों के अनुसार कारीगर ने जब शिवलिंग को ठीक करने के लिए पहला प्रहार किया तो पत्थर में से पानी की धार निकली, दूसरे प्रहार से दूध की धार और तीसरे  प्रहार करने पर शिवलिगं में से खून निकलने लगा | उसी समय से यह शिवलिंग इसी स्वरूप में है।  </p>
<p>श्रद्धालुयों की मान्यता है कि जो भगत लगातार 40 दिन इस मन्दिर में माथा टेकने आते हैं, उनकी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं। </p>
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		<title>शिव जी का मंदिर जहां होता है नंदी का अभिषेक</title>
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		<pubDate>Wed, 04 Jul 2018 14:06:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महादेव के विशालकाय द्वारपाल शक्ति और भक्ति की वो मूर्त हैं, जिनकी आज्ञा के बिना महादेव के दर्शन नहीं होते। बिग बुल मंदिर में 15 फुट के विशालकाय नंदी मौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही भक्तों की निगाहें उस विशालकाय प्रतिमा को एकटक निहारती ही रह जाती हैं। नंदी भोले के द्वारपाल हैं, जिनकी इच्छा...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>महादेव के विशालकाय द्वारपाल शक्ति और भक्ति की वो मूर्त हैं, जिनकी आज्ञा के बिना महादेव के दर्शन नहीं होते। बिग बुल मंदिर में 15 फुट के विशालकाय नंदी मौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही भक्तों की निगाहें उस विशालकाय प्रतिमा को एकटक निहारती ही रह जाती हैं।</p>
<p>नंदी भोले के द्वारपाल हैं, जिनकी इच्छा के बिना भक्ति के द्वार नहीं खुलते। यही वजह है कि हर शिव मंदिर के बाहर उनकी मूर्ति जरूर रहती है और उनके दर्शन करके ही भक्त शिव मंदिर में प्रवेश करते हैं। भक्ति और शक्ति का एक ऐसा ही विशाल स्वरूप देखने को मिलता है बिग बुल मंदिर में।</p>
<p>बंगलूर के बसवनगुड़ी में बिग बुल मंदिर स्थित है। यहां प्रवेश करते ही भक्तों की आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। यहां प्रवेश करते ही नंदी की विशालकाय प्रतिमा महादेव के भक्तों का स्वागत करती है और भोले भंडारी के भक्तों की गुहार उन तक पहुंचाती है। वैसे तो महादेव के हर मंदिर के बाहर नंदी विराजमान रहते हैं और उनकी आज्ञा लेकर ही भक्त मंदिर में प्रवेश करते हैं, लेकिन बिग बुल मंदिर में नाम के ही अनुरूप नंदी की एक  काले रंग के पत्थर की विशालकाय प्रतिमा मौजूद है, जो 15 फुट ऊंची और करीब 20 फुट चौड़ी है और जो दूर-दूर से आने वाले भक्तों के लिए खास आकषर्ण का केंद्र होती है।</p>
<p>बिग बुल मंदिर के नाम पर ही इस इलाके का नाम बसवनगुड़ी पड़ा है, क्योंकि स्थानीय भाषा में बसवन का अर्थ बुल और गुड़ी का अर्थ मंदिर होता है। हिंदू धर्म में बुल को नंदी से जोड़कर ही देखा जाता है, जिसके कारण इस मंदिर का नाम बिग बुल रखा गया। मान्यता है कि सोलहवीं शताब्दी में बने इस मंदिर की स्थापना बंगलूर के संस्थापक केंपी गौंडा ने की थी।</p>
<p>मंदिर में पूजा व शृंगार के अनोखे विधि- विधान हैं, यहां मक्खन से नंदी का अभिषेक किया जाता है। कहते हैं इस शृंगार में करीब 100 किलो मक्खन का इस्तेमाल होता है, जिसके दर्शन कर भक्त निहाल हो उठते हैं। कहते हैं यहां जो भी आता है वो खाली हाथ कभी नहीं लौटता। महादेव बिगड़े काम बनाते हैं। तभी तो नंदी संग शिव के इस मनोहारी रूप के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है।</p>
<p>इस मंदिर का नाम बिग बुल रखने के पीछे भी एक कहानी है। महादेव एक बार जिसे गले लगा लेते हैं उसका साथ कभी नहीं छोड़ते। जिस पर औघड़दानी की कृपा बरसती है वो अजर-अमर हो जाता है। शिव के परमभक्त, उनके वाहन नंदी के साथ भी कुछ ऐसा ही है, तभी तो कोई भी शिवाला हो या फिर कोई मंदिर, हर जगह नंदी शिव परिवार के संग जरूर नजर आते हैं, लेकिन बिग बुल मंदिर में नंदी की भक्ति और उनकी शक्ति की एक अलग ही कहानी देखने और सुनने को मिलती है।</p>
<p>इस मंदिर की स्थापना के पीछे पौराणिक मान्यता है। कहा जाता है कि कई सौ साल पहले इस मंदिर के आसपास बड़ी संख्या में नारियल की खेती की जाती थी, लेकिन एक बार एक जंगली बैल ने पूरे इलाके में हाहाकार मचा दिया, उसने खेतों में घुसकर नारियल की पूरी खेती बरबाद कर दी। तभी गुस्साए हुए एक किसान ने एक डंडे से उस पर हमला कर दिया और देखते-देखते चमत्कार हो गया और वह बैल एक काले रंग की पत्थर की प्रतिमा में बदल गया।</p>
<p>काले रंग की प्रतिमा में बैल का आकार लगातार बढ़ता ही जा रहा था, तब उसके बढ़ते हुए आकार को रोकने के लिए महादेव के प्रतिरूप में त्रिशूल को बैल के माथे में स्थापित किया गया, जिससे बैल का आकार बढ़ना रुक गया। यहीं पर बाद में केंपी गौंडा ने शिवलिंग की स्थापना कर मंदिर का निर्माण करवाया।</p>
<p>इस मंदिर की स्थापना के साथ ही यहां नारियल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई जो आज भी अपने मूल रूप में उसी तरह निभाई जा रही है। हर साल नवंबर-दिसंबर के महीने में यहां नारियल मेले का आयोजन होता है। आम भाषा में इस मेले को कदलकवि परिशे कहा जाता है। मान्यता है कि जब इस मंदिर का निर्माण हुआ तब वहां के किसानों ने नारियल चढ़ाने की परंपरा शुरू की थी, जो गुजरते समय के साथ बढ़ती चली गई। आज भी कई ऐसे किसान हैं जो अपनी फसल का पहला हिस्सा मंदिर में अर्पित करते हैं ।</p>
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