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	<title>Festival 2022 &#8211; Bless TV</title>
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	<title>Festival 2022 &#8211; Bless TV</title>
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		<title>ऑयली खाना खाने से बढ़ सकती है एसिडिटी की समस्या, करें ये खास उपाय!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Oct 2022 07:06:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गलत खान-पान और बदलती जीवनशैली के कारण एसिडिटी की समस्या बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में अगर आप ऑयली खाना खाने से परहेज करते हैं, समय पर खाना खाते हैं और सादा खाना खाते हैं तो एसिडिटी की मात्रा भी कम हो जाती है। लेकिन फेस्टिव सीजन में ऐसा करना काफी मुश्किल हो जाता...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>गलत खान-पान और बदलती जीवनशैली के कारण एसिडिटी की समस्या बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में अगर आप ऑयली खाना खाने से परहेज करते हैं, समय पर खाना खाते हैं और सादा खाना खाते हैं तो एसिडिटी की मात्रा भी कम हो जाती है। लेकिन फेस्टिव सीजन में ऐसा करना काफी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि हर घर में अलग-अलग तरह का खाना बनता है। इस दौरान चकली, चिवड़ा, करंजय, शंकरपाली, लड्डू और तरह-तरह की मिठाइयां खाने का लालच किसी को नहीं रोकता। इन चीजों को हम बिना सोचे समझे खा लेते हैं लेकिन इससे बाद में दिक्कत होती है। इस दौरान एसिडिटी की समस्या बढ़ जाती है। ऐसे में अगर आप कुछ घरेलू नुस्खे जानते हैं तो चुटकी में इस समस्या से निजात पा सकते हैं। इसलिए आज हम आपको कुछ खास घरेलू नुस्खे बताने जा रहे हैं। जिससे आपकी समस्या का तुरंत समाधान हो जाएगा। तो आइए जानते हैं ये खास उपाय&#8230;</p>
<p>अदरक<br />
अदरक अपच के लिए एक प्राकृतिक उपचार है। इसमें मौजूद एंजाइम पेट के एसिड को कम कर सकते हैं। एसिडिटी से छुटकारा पाने के लिए आप अदरक की चाय पी सकते हैं। इसमें नींबू और शहद मिलाकर चाय को स्वादिष्ट बनाया जा सकता है। जो लोग चाय पीना पसंद नहीं करते वे अदरक कैंडी या अदरक और शहद का मिश्रण ले सकते हैं।</p>
<p>सौंफ<br />
सौंफ में एंटीस्पास्मोडिक गुण होते हैं जो पेट दर्द, अपच और मतली को कम करने में मदद करते हैं। आधा चम्मच पिसी हुई सौंफ को पानी में 10 मिनट तक उबालें और फिर छानकर इसका सेवन करें। भोजन के बाद सौंफ को चबाने से भी पेट में आराम मिलता है।</p>
<p>ठंडा दूध<br />
कैल्शियम से भरपूर दूध एसिडिटी की समस्या को दूर करता है। इसलिए जब भी पेट में दर्द या जलन महसूस हो तो उसी समय एक गिलास ठंडा दूध पिएं। यह उपाय उन लोगों के लिए बहुत कारगर है जिन्हें डेयरी उत्पादों को पचाने में समस्या नहीं होती है।</p>
<p>जीरे का सेवन<br />
एसिडिटी को कम करने में जीरा बहुत फायदेमंद होता है। जीरे को पानी में उबालकर पीने से लाभ होता है। इसके साथ ही आधा चम्मच भुना जीरा और पिसा हुआ जीरा गर्म पानी के साथ लेने से भी आराम मिलता है।</p>
<p>दालचीनी की चाय<br />
पेट के विकारों में दालचीनी की चाय बहुत फायदेमंद होती है। एसिडिटी को कम करने के लिए इसका सेवन किया जा सकता है। थोड़ी सी दालचीनी को पानी में उबाल लें। इस पानी को थोड़ा ठंडा होने के बाद नींबू या शहद के साथ पिएं।</p>
<p>केला<br />
यह फल एक प्राकृतिक एंटासिड है, जो नाराज़गी जैसी समस्याओं से तुरंत राहत देता है। जिन लोगों को एसिडिटी अधिक होती है उन्हें नियमित रूप से केला खाना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>दीपावली में दीप जलाते समय रखें विशेष ध्यान, गलती से इस दिशा में न जलाएं बत्तियां, नहीं तो&#8230;!</title>
		<link>https://blesstvlive.com/take-special-care-while-lighting-the-lamp-in-deepawali-dont-accidentally-light-the-lights-in-this-direction-otherwise/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 24 Oct 2022 04:56:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रोशनी का त्योहार यानि दिवाली इस समय चल रही है। दिवाली में हर तरफ रोशनी होती है। दीपावली पर पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ है। दीपों के पर्व में दीपावली का विशेष महत्व है। यह त्योहार दीपों की रोशनी में मनाया जाता है। दिवाली में लक्ष्मी पूजा के दिन दीपक जलाने की परंपरा है।...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>रोशनी का त्योहार यानि दिवाली इस समय चल रही है। दिवाली में हर तरफ रोशनी होती है। दीपावली पर पूरा शहर रोशनी से नहाया हुआ है। दीपों के पर्व में दीपावली का विशेष महत्व है। यह त्योहार दीपों की रोशनी में मनाया जाता है। दिवाली में लक्ष्मी पूजा के दिन दीपक जलाने की परंपरा है। हर जगह दीप जलाकर रोशनी की जाती है। दिवाली को रोशन करने के कुछ उचित तरीके भी हैं। दीपक जलाते समय विशेष ध्यान रखना बहुत जरूरी है। क्योंकि गलत दिशा में रोशनी करने से बड़ा नुकसान हो सकता है।</p>
<p>ऋग्वेद के अनुसार दीपक में देवता का वास बताया गया है। इसलिए पूजा से पहले दीया जलाने की परंपरा है। साथ ही किसी भी शुभ कार्य से पहले दीपक जलाया जाता है। शास्त्र के अनुसार भगवान की मूर्ति या फोटो के सामने हमेशा दीपक जलाना चाहिए। कहा जाता है कि बाएं हाथ में घी का दीपक और दाहिने हाथ में तेल का दीपक रखना चाहिए। इसी प्रकार दीपक जलाते समय शुभ मुहूर्त का ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि शुभ अवसर पर दीपक जलाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।</p>
<p>जैसे दीपक महत्वपूर्ण है, वैसे ही दीपक की बाती भी महत्वपूर्ण है। अगर आप घी की बाती का इस्तेमाल कर रहे हैं तो दीपक में रूई की बाती का इस्तेमाल करना सबसे अच्छा माना जाता है। यदि आप तेल का दीपक जला रहे हैं, तो लाल धागे की बाती जलाना सबसे अच्छा है। दीपक और बत्ती के महत्व के साथ-साथ दीपक को किस दिशा में लगाना चाहिए, इसका भी विशेष ध्यान रखना बहुत जरूरी है। अक्सर हम इसका ध्यान नहीं रखते हैं, इसलिए नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाती है। दीपक को कभी भी कोने में नहीं रखना चाहिए। दीपक को कभी भी पश्चिम दिशा में नहीं रखना चाहिए। साथ ही यह भी कहा जाता है कि दिवाली के त्योहार के दौरान टूटे हुए दीपक का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मां लक्ष्मी नाराज होती हैं। तो आज हम जानेंगे किस दिशा में रोशनी करने से होने वाले फायदे….</p>
<p>किस दिशा में दीया जलाने के फायदे –<br />
पूर्व दिशा &#8211;<br />
दीपक की लौ को पूर्व दिशा में रखने से आयु में वृद्धि होती है।</p>
<p>पश्चिम दिशा-<br />
दीपक की लौ को पश्चिम दिशा में रखने से दुख में वृद्धि होती है।</p>
<p>उत्तर दिशा-<br />
दीपक की लौ को उत्तर दिशा में रखने से धन की प्राप्ति होती है।</p>
<p>दक्षिण दिशा-<br />
दीपक की लौ को दक्षिण दिशा में रखने से नुकसान होता है। यह नुकसान किसी भी व्यक्ति या धन को हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>दिवाली के इस शुभ मुहूर्त में करें मां लक्ष्मी की पूजा, जानिए समय और महत्व</title>
		<link>https://blesstvlive.com/worship-maa-lakshmi-in-this-auspicious-time-of-diwali-know-the-time-and-importance/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Oct 2022 05:11:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रोशनी का त्योहार दिवाली इस साल 24 अक्टूबर (सोमवार) को मनाई जाएगी। दिवाली हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार है। दिवाली हर साल आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन मनाई जाती है। दीपावली रोशनी का त्योहार है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त करके अयोध्या लौटे थे...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>रोशनी का त्योहार दिवाली इस साल 24 अक्टूबर (सोमवार) को मनाई जाएगी। दिवाली हिंदू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार है। दिवाली हर साल आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन मनाई जाती है। दीपावली रोशनी का त्योहार है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त करके अयोध्या लौटे थे और इसी खुशी में अयोध्या के सभी लोगों ने भगवान राम के स्वागत के लिए पूरे शहर में दीप जलाकर प्रकाश पर्व मनाया। इसके अलावा ऐसी भी मान्यता है कि दिवाली के दिन देवी लक्ष्मी के दर्शन होते हैं। इसलिए दिवाली में लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन दीपदान का भी महत्व माना जाता है।</p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को समुद्र मंथन के समय देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार इसी दिन देवी लक्ष्मी का विवाह भगवान विष्णु से हुआ था। इसलिए हर साल दिवाली में लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। दिवाली आने के कई दिन पहले से ही घर की साफ-सफाई और साज-सज्जा शुरू हो जाती है। दीपावली की संध्या के शुभ मुहूर्त पर लक्ष्मी-गणेश, कुबेर और मां सरस्वती की विशेष पूजा की जाती है. आइए जानते हैं इस दिवाली किस शुभ मुहूर्त में करें लक्ष्मी-गणेश की पूजा।</p>
<p>हैप्पी दिवाली 2022<br />
कार्तिक अमावस्या शुरू: 24 अक्टूबर को 06:03<br />
कार्तिक अमावस्या समाप्ति: 24 अक्टूबर 2022 दोपहर 02:44 बजे</p>
<p>अभिजीत मुहूर्त: 24 अक्टूबर सुबह 11:19 बजे से दोपहर 12:05 बजे तक<br />
विजय मुहूर्त: 24 अक्टूबर दोपहर 01:36 बजे से दोपहर 02:21 बजे तक</p>
<p>लक्ष्मी पूजा मुहूर्त: 24 अक्टूबर शाम 06:53 बजे से शाम 08:16 बजे तक<br />
पूजा की अवधि: 1 घंटा 21 मिनट</p>
<p>अमृत ​​काल मुहूर्त: 24 अक्टूबर सुबह 08.40 बजे से 10.16 बजे तक<br />
दोषपूर्ण काल ​​: 17:43:11 से 20:16:07 तक<br />
वृष अवधि : 18:54:52 से 20:50:43 . तक</p>
<p>लक्ष्मी पूजा के शुभ मुहूर्त का महत्व<br />
दीपावली देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दिवाली के दौरान देवी लक्ष्मी के साथ, भगवान गणेश, कुबेर और सरस्वती की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार प्रदोष काल में लक्ष्मी जी की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। प्रदोष काल का अर्थ है सूर्यास्त के बाद तीन मुहूर्त। इसके अलावा प्रदोष काल में स्थिर विवाह में लक्ष्मी की पूजा करना सर्वोत्तम माना जाता है। इसके अलावा महानिष्ठ काल में भी लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>महानवमी के दिन होती है माता सिद्धिदात्री की पूजा, यहां देखें शुभ मुहूर्त और पूजा अनुष्ठान</title>
		<link>https://blesstvlive.com/mata-siddhidatri-is-worshiped-on-the-day-of-mahanavami-see-here-the-auspicious-time-and-worship-rituals/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 04 Oct 2022 05:45:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नवरात्रि का समापन महानवमी के साथ होता है। इस दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा की जाती है। कमल पर विराजमान माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। महानवमी का दिन बहुत खास होता है। इस दिन देवी की कृपा पाने के लिए कन्या पूजन करना चाहिए। छोटी लड़कियों को...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नवरात्रि का समापन महानवमी के साथ होता है। इस दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा की जाती है। कमल पर विराजमान माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। महानवमी का दिन बहुत खास होता है। इस दिन देवी की कृपा पाने के लिए कन्या पूजन करना चाहिए। छोटी लड़कियों को देवी माना जाता है। इसलिए इनकी पूजा करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा नवमी के दिन हवन करना भी शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं महानवमी पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा अनुष्ठान</p>
<p>महानवमी शुभ क्षण<br />
महानवमी 3 अक्टूबर को शाम 4:37 बजे शुरू हुई और आज 4 अक्टूबर को दोपहर 2:20 बजे समाप्त होगी। उदयतिथि के अनुसार 4 अक्टूबर यानि आज महानवमी व्रत और पूजा होगी. इस दिन कन्या पूजा का विशेष महत्व होता है और कहा जाता है कि छोटी कन्याओं की पूजा करने से देवी प्रसन्न होती हैं। इस दिन 2 से 9 साल की उम्र की लड़कियों को भोजन दान करना शुभ माना जाता है।</p>
<p>महानवमी पूजा अनुष्ठान<br />
महानवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर लेना चाहिए और साफ कपड़े पहनकर मंदिर की सफाई करनी चाहिए। इसके बाद मां सिद्धिदात्री की पूजा करनी चाहिए। आरती और मंत्रों का जाप भी करना चाहिए। मंदिर में देवी की छवि के सामने घी का दीपक जलाएं और देवी को सिंदूर लगाएं। इसके बाद देवी को फल, मिठाई, फूल आदि चढ़ाएं और देवी के मंदिर में बैठकर आरती और मंत्रों का जाप करें और ध्यान करें। ऐसा माना जाता है कि इससे देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसके बाद कन्या पूजन करें।</p>
<p>यो बातों का ध्यान रखें<br />
कन्या पूजन केवल 2 से 9 वर्ष की आयु की लड़कियों के लिए ही किया जाना चाहिए। पूजा के लिए 9 कन्याओं की आवश्यकता होती है और एक लड़के को लंगूर भी कहा जाता है। यदि कन्या पूजा के लिए 9 कन्याएं नहीं मिलती हैं तो 7 कन्याओं को कन्या पूजन भी किया जा सकता है। कन्या पूजन करते समय कन्याओं को आसन पर बैठाकर उनके पैर धोकर तिलक लगाना चाहिए। फिर उन्हें खीर, पूरी और चना खिलाएं। इसके बाद दक्षिणा दें और उन्हें विदा करें।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दुर्गा अष्टमी पर करें ये काम, प्रसन्न होंगी मां दुर्गा, सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी</title>
		<link>https://blesstvlive.com/do-this-work-on-durga-ashtami-mother-durga-will-be-pleased-all-wishes-will-be-fulfilled/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Oct 2022 05:14:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
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					<description><![CDATA[शारदीय नवरात्रि महोत्सव पूरे देश में  उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आज (3 अक्टूबर) नवरात्रि का आठवां दिन यानि दुर्गा अष्टमी है। दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। जिन घरों में अष्टमी की पूजा होती है, वहां दुर्गा अष्टमी पर कन्या पूजन के साथ व्रत तोड़ा...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्रि महोत्सव पूरे देश में  उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। आज (3 अक्टूबर) नवरात्रि का आठवां दिन यानि दुर्गा अष्टमी है। दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। जिन घरों में अष्टमी की पूजा होती है, वहां दुर्गा अष्टमी पर कन्या पूजन के साथ व्रत तोड़ा जाता है। माना जाता है कि अष्टमी पूजा के बाद कन्या की पूजा करने से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। धार्मिक दृष्टि से दुर्गा अष्टमी का दिन बहुत ही शुभ होता है। इस दिन कुछ काम करने से देवी प्रसन्न होती हैं।</p>
<p>दुर्गाष्टमी पर करें ये उपाय<br />
हवन : दुर्गा अष्टमी के दिन हवन करना शुभ माना जाता है। हवन करने से देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और घर का वातावरण भी शुद्ध होता है। ऐसा माना जाता है कि यज्ञ करने से घर से सारी नकारात्मकता दूर हो जाती है। यह भी धार्मिक रूप से माना जाता है कि हवन करने से देवी दुर्गा की कृपा मिलती है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हवन करने से दुर्गाष्टमी का व्रत पूर्ण माना जाता है।</p>
<p>कन्या पूजन: छोटी कन्याओं को देवी का प्रतीक माना जाता है। इसलिए नवरात्रि पर्व में कन्या पूजन का बहुत महत्व है। कन्या पूजन के साथ पूजा संपन्न होती है। दुर्गा अष्टमी के दिन 9 कन्याओं की पूजा कर उन्हें भोजन कराना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।</p>
<p>लाल चुनरी : देवी दुर्गा की कृपा पाने के लिए दुर्गा अष्टमी के दिन देवी की पूजा करनी चाहिए और पूजा में देवी को लाल चुनरी अर्पित करनी चाहिए. पूजा के बाद देवी की आरती करवाएं और मंत्रों का जाप भी करें। देवी को लाल चुनरी चढ़ाते समय उसके साथ 5 प्रकार के मेवे भी चढ़ाने चाहिए।</p>
<p>श्रृंगार सामग्री: दुर्गा अष्टमी पर विवाहित महिलाओं को देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए श्रृंगार सामग्री चढ़ानी चाहिए। इन प्रसाद में चांदी के जोडवे, कुंकू, सिंदूर, पैजान, चांदी के सिक्के और चूड़ियां आदि शामिल होने चाहिए।</p>
<p>बट्टाशा प्रसाद: दुर्गाष्टमी के दिन देवी को प्रसन्न करने के लिए पूजा में बत्तशा का भोग लगाना चाहिए। साथ ही देवी को मालपुआ और खीर का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है। इससे भक्तों का भला होता है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भगवान गणेश का जन्म लेण्याद्री पर्वत पर हुआ था, ऐसी है श्री गिरिजात्मजा की कथा</title>
		<link>https://blesstvlive.com/lord-ganesha-was-born-on-the-lenyadri-mountain-such-is-the-story-of-shri-girijatmaja/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Rohit Sharma]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Sep 2022 07:37:03 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Lenyadri Girijatmaj Ganpati]]></category>
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					<description><![CDATA[राज्य में दस दिवसीय गणेशोत्सव बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। महाराष्ट्र में गणेश के प्रसिद्ध अष्टविनायक स्थान हैं। इस गणेशोत्सव में हम इन सभी अष्टविनायकों की जानकारी जानने वाले हैं। अष्टविनायकों में मोरगांव के मोरेश्वर, थेउर के श्री चिंतामणि गणपति, सिद्धटेक के श्री सिद्धिविनायक, रंजनगांव के महागणपति, ओजर के विग्नेश्वर,...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>राज्य में दस दिवसीय गणेशोत्सव बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। महाराष्ट्र में गणेश के प्रसिद्ध अष्टविनायक स्थान हैं। इस गणेशोत्सव में हम इन सभी अष्टविनायकों की जानकारी जानने वाले हैं। अष्टविनायकों में मोरगांव के मोरेश्वर, थेउर के श्री चिंतामणि गणपति, सिद्धटेक के श्री सिद्धिविनायक, रंजनगांव के महागणपति, ओजर के विग्नेश्वर, लेन्याद्री के श्री गिरिजात्मज, महाड के वरदविनायक और पाली के श्री बल्लालेश्वर शामिल हैं।</p>
<p>श्री गिरिजात्मज, लेन्याद्रिक<br />
अष्टविनायकों में लेन्याद्रि के श्री गिरिजात्मज छठे गणपति हैं। श्री गिरिजात्मज गणेश का यह निवास जुन्नार तालुक में प्राचीन जुन्नार गुफाओं के आसपास और शिवनेरी किले के आसपास कुकड़ी नदी के आसपास एक पहाड़ पर स्थित है। पत्थर में खुदी हुई भगवान गणेश की एक मनभावन मूर्ति है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पहाड़ से करीब 400 सीढ़ियां चढ़नी हैं। लेन्याद्री का श्री गिरिजात्मज जुन्नार से 7 किमी, जबकि पुणे से लगभग 97 किमी दूर है। है</p>
<p>श्री गिरिजात्मजा मंदिर की विशेषताएं<br />
हालांकि गिरिजात्मज विनायक का यह मंदिर दक्षिण की ओर है, मूर्ति का मुख उत्तर की ओर है। गणेश की मूर्ति की सूंड बाईं ओर है। मूर्ति की नाभि और माथा हीरा है। मूर्ति के बाएं और दाएं तरफ हनुमान और शिव शंकर हैं। मंदिर को इस तरह से बनाया गया है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक मंदिर में रोशनी रहती है। इसलिए, भले ही यह पहाड़ों में बना हो, लेकिन इस मंदिर में एक भी बिजली का दीपक नहीं है। यह मंदिर गुफाओं के समूह में है। तो पूरा मंदिर पूरी तरह से पत्थर से तराशा गया है। मंदिर में डोंगरा के बगल में गभरा है। मंदिर के पीछे कोई सीट नहीं है। इसलिए यहां परिक्रमा संभव नहीं है। माना जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास के दौरान इन गुफाओं का निर्माण किया था। इसलिए गुफाओं के इस समूह को पांडव गुफाएं कहा जाता है। गुफा में एक मुख्य हॉल और 18 छोटे कमरे हैं। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि उस समय यहां आने वाले श्रद्धालु यहां बैठकर ध्यान कर सकें।</p>
<p>श्री गिरिजात्मजा की कथा<br />
गणेश पुराण के अनुसार, देवी सती ने पार्वती का अवतार लिया और गणेश को जन्म दिया। इसके लिए देवी पार्वती ने लेन्याद्रि पर्वत पर घोर तपस्या की और भाद्रपद चतुर्थी पर अपने ही मलमूत्र से एक मूर्ति बनाई। इसके बाद देवी पार्वती ने उसमें प्राण फूंक दिए और छह भुजाओं और तीन नेत्रों वाला एक बालक उनके सामने प्रकट हुआ। देवी ने उसका नाम विनायक रखा। इस प्रकार भगवान गणेश का जन्म हुआ। देवी पार्वती को गिरिजा भी कहा जाता है। इसलिए इस विनायक का नाम गिरिजातक पड़ा। कहा जाता है कि गणपति अपने आदिवासी अवतार में 15 साल तक लेन्याद्रि पर रहे थे। किंवदंती है कि श्री गणेश ने इस अवतार में कई राक्षसों का वध किया था।</p>
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