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	<title>bless tv &#8211; Bless TV</title>
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	<title>bless tv &#8211; Bless TV</title>
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		<title>इच्छा की देवी माता कामाख्या । जानिये मंदिर की लोकप्रियता का मुख्य कारण ।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 Apr 2022 12:03:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[माता कामाख्या सभी भक्तों का कल्याण करें&#x1f490; माँ कामाख्या या कामेश्वरी को इच्छा की देवी कहा जाता है। कामाख्या देवी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तर पूर्व भारत में असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के पश्चिमी भाग में स्थित नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित है। मां कामाख्या देवालय को पृथ्वी पर 51 शक्ति-पीठों में सबसे पवित्र...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>माता कामाख्या सभी भक्तों का कल्याण करें<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
माँ कामाख्या या कामेश्वरी को इच्छा की देवी कहा जाता है। कामाख्या देवी का प्रसिद्ध मंदिर उत्तर पूर्व भारत में असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के पश्चिमी भाग में स्थित नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित है। मां कामाख्या देवालय को पृथ्वी पर 51 शक्ति-पीठों में सबसे पवित्र और सबसे पुरातन माना जाता है। यह भारत में व्यापक रूप से प्रचलित तांत्रिक शक्तिवाद पंथ का केंद्रबिंदु है। मां कामाख्या देवी का मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि यह मंदिर देवी के रजस्वला की वजह से अधिक प्रसिद्ध है और लोगों के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर में एक चट्टान के रूप में बनी योनि से रक्त का स्राव होता है जो इस मंदिर की लोकप्रियता का मुख्य कारण है।</p>
<p>कामाख्या देवी मंदिर का इतिहास –<br />
माना जाता है कि कामाख्या देवी मंदिर का निर्माण मध्यकाल के दौरान कराया गया था। कोच राजा बिस्व सिंघ ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1553-54 में कराया था। बाद में गौड़ के एक मुस्लिम आक्रमणकारी कालापहाड़ ने मंदिर को नष्ट करा दिया। इसके बाद राजा बिस्व सिंघ के उत्तराधिकारी महान कोच राजा नरनारायण ने अपने भाई चिलाराई के साथ इस स्थान का निरीक्षण किया और इसे पूरी तरह खंडहर में पाया।नारायण ने 1565 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और मंदिर को शाही संरक्षण दिया।17 वीं शताब्दी की शुरुआत में अहोम ने इस मंदिर का निर्माण कई तरह के पत्थरों से कराया जिसका प्रमाण मंदिर के शिलालेख और तांबे की प्लेट से मिलता है। 1897 ई. में भूकंप के कारण मुख्य मंदिर को बहुत नुकसान पहुँचा और कामाख्या के कुछ अन्य मंदिरों के गुंबद गिर गए। कोचबिहार का शाही दरबार बचाव में आया और मरम्मत के लिए मोटी रकम दान की। मंदिर की मरम्मत कई बार की गई। मंदिर को विभिन्न राजाओं का शाही संरक्षण प्राप्त हुआ।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-16313" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-300x200.jpg" alt="" width="577" height="384" srcset="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-300x200.jpg 300w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-1024x683.jpg 1024w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-768x512.jpg 768w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple-600x400.jpg 600w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/1624720797_kamakhya-temple.jpg 1200w" sizes="(max-width: 577px) 100vw, 577px" /></p>
<p>पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सती ने अपना विवाह भगवान शंकर के साथ रचाया। लेकिन सती के विवाह से उनके पिता दक्ष प्रसन्न नहीं हुए। जब एक बार सती के पिता राजा दक्ष ने एक यज्ञ आयोजित किया तो इसमें उनके पति को नहीं बुलाया जिससे माता सती बिना बुलाए पिता के घर पहुंच गईं। वहां उनके पिता ने भगवान शंकर का अपमान किया। माता सती अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पायीं और हवन कुंड में कूद गईं। पता चलने पर भगवान शिव वहां पहुंचे और सती का शव लेकर तांडव करने लगे। जब उन्हें रोकने के लिए विष्णु ने सुदर्शन चक्र फेंका तो सती का शव 51 भागों में कटकर विभिन्न स्थानों पर जा गिरा। इसमें से माता सती की योनि और उनका गर्भ जिस स्थान पर गिरा वहीं पर एक मंदिर बनाया गया जिसे कामाख्या देवी मंदिर के नाम से जानते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-16312" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/download.jpg" alt="" width="526" height="337" /></p>
<p>कामाख्या देवी मंदिर के बारे में रोचक तथ्य:<br />
कामाख्या देवी का मंदिर भारत में स्थित अन्य देवियों के मंदिरों से काफी अलग है। यही एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां देवी का रजस्वला समाप्त होने के बाद श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए उमड़ते हैं।</p>
<p>आइये जानते हैं शक्तिपीठ कामाख्या देवी मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य।<br />
माँ कामाख्या का मंदिर दशमहाविद्याओं यानि देवताओं के दस अवतार त्रिपुरा सुंदरी, मातंगी,कमला,काली,तारा,भुवनेश्वरी,बगलामुखी, छिन्नमस्ता,भैरवी,धूमावती को समर्पित मंदिर हैं। यहां भगवान शिव के पांच मंदिर कामेश्वर, सिद्धेश्वर, केदारेश्वर, अमरत्सोस्वर, अघोर स्थित हैं। शक्तिपीठ मां कामाख्या के मंदिर में प्रसिद्ध अंबुबाची मेला लगता है जो चार दिनों तक चलता है। कामाख्या देवी मंदिर का अंबुबाची मेला बहुत ही लोकप्रिय है और यह मंदिर की कई विशेषताओं में से एक है। यह मंदिर कामाख्या देवी के मासिक धर्म के कारण प्रसिद्ध है। माना जाता है कि आषाढ़ महीने के सातवें दिन मां कामाख्या को माहवारी शुरू होती है और जब उनकी माहवारी खत्म होती है तो मेले में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर एक मील ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहां श्रद्धालु मां के जयकारे लगाते हुए पहुंचते हैं। कामाख्या देवी मंदिर में जब मेले का आयोजन किया जाता है तब देशभर के तांत्रिक इस मेले में भाग लेने पहुंचते हैं। मंदिर की एक अन्य विशेषता यह है कि जब मां कामाख्या रजस्वला होती हैं तो जलकुंड में पानी की जगह खून बहता है। कामाख्या देवी मंदिर की यह खासियत है कि जब तक देवी में रजस्वला होती हैं,तब तक मंदिर का कपाट बंद रहता है। मंदिर का कपाट बंद होने से पहले यहां एक सफेद कपड़ा बिछाया जाता है और जब कपाट खुलता है तो यह कपड़ा बिल्कुल लाल रहता है। इस लाल कपड़े को अंबुबाची मेले में आये श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। मंदिर परिसर में योनि के आकार की एक समतल चट्टान है जिसकी पूजा की जाती है। कामाख्या देवी का मंदिर पशुओं की बलि देने के लिए भी प्रसिद्ध् है लेकिन एक खासियत यह भी है कि यहां मादा पशुओं की बलि नहीं दी जाती है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone  wp-image-16314" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-300x225.jpg" alt="" width="513" height="385" srcset="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-300x225.jpg 300w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-768x576.jpg 768w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi-370x278.jpg 370w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/kamakhya_devi.jpg 1024w" sizes="(max-width: 513px) 100vw, 513px" /></p>
<p>कामाख्या देवी मंदिर में पूजा का समय –<br />
सुबह साढ़े पांच बजे कामाख्या देवी को स्नान कराया जाता है और छह बजे नित्य पूजा होती है। इसके बाद सुबह आठ बजे मंदिर का कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है। दोपहर एक बजे मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है और देवी को भोग लगाकर प्रसाद श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। दोपहर ढाई बजे मंदिर का कपाट दोबारा से भक्तों के लिए खोला जाता है और रात साढ़े सात बजे कामाख्या देवी की आरती के बाद मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है।</p>
<p>माँ कामाख्या देवी बीज मंत्र –<br />
&#8220;क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः&#8221;<br />
|| त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये<br />
प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूँ हूँ त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा ||</p>
<p>माँ कामाख्या देवी प्रणाम मंत्र –<br />
कामाख्ये कामसम्पन्ने कामेश्वरि हरप्रिये।<br />
कामनां देहि मे नित्यं कामेश्वरि नमोऽस्तु ते॥<br />
समस्त चराचर प्राणियों एवं सकल विश्व<br />
का कल्याण करो माता कामाख्या भवानी<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
जयति सनातन<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
जयतु भारतं<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
सदा सर्वदासुमंगल<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
हर हर महादेव<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
ॐ नमश्चण्डिकायै<img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f490.png" alt="💐" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><br />
जयभवानी</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में  अंतर</title>
		<link>https://blesstvlive.com/difference-between-rishi-muni-sadhu-and-sanyasi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Bhuwan Chandra]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Apr 2022 12:13:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। आईये आज के इस पोस्ट में देखते हैं ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी में कौन होते हैं और इनमे क्या अंतर है ?</p>
<p>ऋषि कौन होते हैं</p>
<p>भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं।</p>
<p>ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस ज्ञान को लिखकर प्रकट किये ऋषि कहलाये। ऋषियों के लिए इसी लिए कहा गया है &#8220;ऋषि: तु मन्त्र द्रष्टारा : न तु कर्तार : अर्थात ऋषि मंत्र को देखने वाले हैं न कि उस मन्त्र की रचना करने वाले। हालाँकि कुछ स्थानों पर ऋषियों को वैदिक ऋचाओं की रचना करने वाले के रूप में भी व्यक्त किया गया है।</p>
<p>ऋषि शब्द का अर्थ</p>
<p>ऋषि शब्द &#8220;ऋष&#8221; मूल से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ देखना होता है। इसके अतिरिक्त ऋषियों के प्रकाशित कृत्य को आर्ष कहा जाता है जो इसी मूल शब्द की उत्पत्ति है। दृष्टि यानि नज़र भी ऋष से ही उत्पन्न हुआ है। प्राचीन ऋषियों को युग द्रष्टा माना जाता था और माना जाता था कि वे अपने आत्मज्ञान का दर्शन कर लिए हैं। ऋषियों के सम्बन्ध में मान्यता थी कि वे अपने योग से परमात्मा को उपलब्ध हो जाते थे और जड़ के साथ साथ चैतन्य को भी देखने में समर्थ होते थे। वे भौतिक पदार्थ के साथ साथ उसके पीछे छिपी ऊर्जा को भी देखने में सक्षम होते थे।</p>
<p>ऋषियों के प्रकार</p>
<p>ऋषि वैदिक संस्कृत भाषा से उत्पन्न शब्द माना जाता है। अतः यह शब्द वैदिक परंपरा का बोध कराता है जिसमे एक ऋषि को सर्वोच्च माना जाता है अर्थात ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी से श्रेष्ठ होता है। अमरसिंहा द्वारा संकलित प्रसिद्ध संस्कृत समानार्थी शब्दकोष के अनुसार ऋषि सात प्रकार के होते हैं ब्रह्मऋषि, देवर्षि, महर्षि, परमऋषि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि।</p>
<p>सप्त ऋषि</p>
<p>पुराणों में सप्त ऋषियों का केतु, पुलह, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ और भृगु का वर्णन है। इसी तरह अन्य स्थान पर सप्त ऋषियों की एक अन्य सूचि मिलती है जिसमे अत्रि, भृगु, कौत्स, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस तथा दूसरी में कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि, भरद्वाज को सप्त ऋषि कहा गया है।</p>
<p>मुनि किसे कहते हैं</p>
<p>मुनि भी एक तरह के ऋषि ही होते थे किन्तु उनमें राग द्वेष का आभाव होता था। भगवत गीता में मुनियों के बारे में कहा गया है जिनका चित्त दुःख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे निस्चल बुद्धि वाले संत मुनि कहलाते हैं।</p>
<p>मुनि शब्द मौनी यानि शांत या न बोलने वाले से निकला है। ऐसे ऋषि जो एक विशेष अवधि के लिए मौन या बहुत कम बोलने का शपथ लेते थे उन्हीं मुनि कहा जाता था। प्राचीन काल में मौन को एक साधना या तपस्या के रूप में माना गया है। बहुत से ऋषि इस साधना को करते थे और मौन रहते थे। ऐसे ऋषियों के लिए ही मुनि शब्द का प्रयोग होता है। कई बार बहुत कम बोलने वाले ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग होता था। कुछ ऐसे ऋषियों के लिए भी मुनि शब्द का प्रयोग हुआ है जो हमेशा ईश्वर का जाप करते थे और नारायण का ध्यान करते थे जैसे नारद मुनि।</p>
<p>मुनि शब्द का चित्र,मन और तन से गहरा नाता है। ये तीनों ही शब्द मंत्र और तंत्र से सम्बन्ध रखते हैं। ऋग्वेद में चित्र शब्द आश्चर्य से देखने के लिए प्रयोग में लाया गया है। वे सभी चीज़ें जो उज्जवल है, आकर्षक है और आश्चर्यजनक है वे चित्र हैं। अर्थात संसार की लगभग सभी चीज़ें चित्र शब्द के अंतर्गत आती हैं। मन कई अर्थों के साथ साथ बौद्धिक चिंतन और मनन से भी सम्बन्ध रखता है। अर्थात मनन करने वाले ही मुनि हैं। मन्त्र शब्द मन से ही निकला माना जाता है और इसलिए मन्त्रों के रचयिता और मनन करने वाले मनीषी या मुनि कहलाये। इसी तरह तंत्र शब्द तन से सम्बंधित है। तन को सक्रीय या जागृत रखने वाले योगियों को मुनि कहा जाता था।</p>
<p>जैन ग्रंथों में भी मुनियों की चर्चा की गयी है। वैसे व्यक्ति जिनकी आत्मा संयम से स्थिर है, सांसारिक वासनाओं से रहित है, जीवों के प्रति रक्षा का भाव रखते हैं, अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, ईर्या (यात्रा में सावधानी ), भाषा, एषणा(आहार शुद्धि ) आदणिक्षेप(धार्मिक उपकरणव्यवहार में शुद्धि ) प्रतिष्ठापना(मल मूत्र त्याग में सावधानी )का पालन करने वाले, सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, वंदन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायतसर्ग करने वाले तथा केशलोच करने वाले, नग्न रहने वाले, स्नान और दातुन नहीं करने वाले, पृथ्वी पर सोने वाले, त्रिशुद्ध आहार ग्रहण करने वाले और दिन में केवल एक बार भोजन करने वाले आदि 28 गुणों से युक्त महर्षि ही मुनि कहलाते हैं।</p>
<p>मुनि ऋषि परंपरा से सम्बन्ध रखते हैं किन्तु वे मन्त्रों का मनन करने वाले और अपने चिंतन से ज्ञान के व्यापक भंडार की उत्पति करने वाले होते हैं। मुनि शास्त्रों का लेखन भी करने वाले होते हैं</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone wp-image-16288" src="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/sadhu-300x169.jpeg" alt="" width="693" height="391" srcset="https://blesstvlive.com/storage/2022/04/sadhu-300x169.jpeg 300w, https://blesstvlive.com/storage/2022/04/sadhu.jpeg 720w" sizes="auto, (max-width: 693px) 100vw, 693px" /></p>
<p>साधु कौन होते हैं</p>
<p>किसी विषय की साधना करने वाले व्यक्ति को साधु कहा जाता है। प्राचीन काल में कई व्यक्ति समाज से हट कर या कई बार समाज में ही रहकर किसी विषय की साधना करते थे और उस विषय में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करते थे। विषय को साधने या उसकी साधना करने के कारण ही उन्हें साधु कहा गया।</p>
<p>कई बार अच्छे और बुरे व्यक्ति में फर्क करने के लिए भी साधु शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका कारण है कि सकारात्मक साधना करने वाला व्यक्ति हमेशा सरल, सीधा और लोगों की भलाई करने वाला होता है। आम बोलचाल में साध का अर्थ सीधा और दुष्टता से हीन होता है। संस्कृत में साधु शब्द से तात्पर्य है सज्जन व्यक्ति। लघुसिद्धांत कौमुदी में साधु का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि &#8220;साध्नोति परकार्यमिति साधु : अर्थात जो दूसरे का कार्य करे वह साधु है। साधु का एक अर्थ उत्तम भी होता है ऐसे व्यक्ति जिसने अपने छह विकार काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर का त्याग कर दिया हो, साधु कहलाता है।</p>
<p>साधु के लिए यह भी कहा गया है &#8220;आत्मदशा साधे &#8221; अर्थात संसार दशा से मुक्त होकर आत्मदशा को साधने वाले साधु कहलाते हैं। वर्तमान में वैसे व्यक्ति जो संन्यास दीक्षा लेकर गेरुआ वस्त्र धारण करते हैं और जिनका मूल उद्द्येश्य समाज का पथ प्रदर्शन करते हुए धर्म के मार्ग पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं, साधु कहलाते हैं।</p>
<p>संन्यासी किसे कहते हैं</p>
<p>सन्न्यासी धर्म की परम्परा प्राचीन हिन्दू धर्म से जुडी नहीं है। वैदिक काल में किसी संन्यासी का कोई उल्लेख नहीं मिलता। सन्न्यासी या सन्न्यास की अवधारणा संभवतः जैन और बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद की है जिसमे सन्न्यास की अपनी मान्यता है। हिन्दू धर्म में आदि शंकराचार्य को महान सन्न्यासी माना गया है।</p>
<p>सन्न्यासी शब्द सन्न्यास से निकला हुआ है जिसका अर्थ त्याग करना होता है। अतः त्याग करने वाले को ही सन्न्यासी कहा जाता है। सन्न्यासी संपत्ति का त्याग करता है, गृहस्थ जीवन का त्याग करता है या अविवाहित रहता है, समाज और सांसारिक जीवन का त्याग करता है और योग ध्यान का अभ्यास करते हुए अपने आराध्य की भक्ति में लीन हो जाता है।</p>
<p>हिन्दू धर्म में तीन तरह के सन्न्यासियों का वर्णन है</p>
<p>परिव्राजकः सन्न्यासी : भ्रमण करने वाले सन्न्यासियों को परिव्राजकः की श्रेणी में रखा जाता है। आदि शंकराचार्य और रामनुजनाचार्य परिव्राजकः सन्यासी ही थे।</p>
<p>परमहंस सन्न्यासी : यह सन्न्यासियों की उच्चत्तम श्रेणी है।</p>
<p>यति : सन्यासी : उद्द्येश्य की सहजता के साथ प्रयास करने वाले सन्यासी इस श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।</p>
<p>वास्तव में संन्यासी वैसे व्यक्ति को कह सकते हैं जिसका आतंरिक स्थिति स्थिर है और जो किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति से प्रभावित नहीं होता है और हर हाल में स्थिर रहता है। उसे न तो ख़ुशी से प्रसन्नता मिलती है और न ही दुःख से अवसाद। इस प्रकार निरपेक्ष व्यक्ति जो सांसारिक मोह माया से विरक्त अलौकिक और आत्मज्ञान की तलाश करता हो संन्यासी कहलाता है।</p>
<p>उपसंहार</p>
<p>ऋषि, मुनि, साधु या फिर संन्यासी सभी धर्म के प्रति समर्पित जन होते हैं जो सांसारिक मोह के बंधन से दूर समाज कल्याण हेतु निरंतर अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हेतु तपस्या, साधना, मनन आदि करते हैं।</p>
<p>।।जय श्री राम।।<br />
।जय महाकाल।।<br />
जयतु भारत <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/17.0.2/72x72/1f6a9.png" alt="🚩" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /></p>
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		<item>
		<title>श्री पटना साहिब: सिख धर्म का दूसरा प्रमुख तख्त</title>
		<link>https://blesstvlive.com/sri-patna-sahib-history/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:52:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सिख इतिहास में पटना साहिब (बिहार) का खास महत्व है. सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जन्म यहीं 22 दिसंबर, 1666 को हुआ था. सिख धर्म के पांच प्रमुख तख्तों में दूसरा तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब हैं. सिखों के दसवें गुरु का न केवल यहां जन्म हुआ था, बल्कि उनका बचपन भी...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>सिख इतिहास में पटना साहिब (बिहार) का खास महत्व है. सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जन्म यहीं 22 दिसंबर, 1666 को हुआ था. सिख धर्म के पांच प्रमुख तख्तों में दूसरा तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब हैं.</p>
<p>सिखों के दसवें गुरु का न केवल यहां जन्म हुआ था, बल्कि उनका बचपन भी यहीं गुजरा था. यही नहीं सिखों के तीन गुरुओं के चरण इस धरती पर पड़े हैं. हरिमंदिर साहिब गुरु गोविंद सिंह की याद में बनाया गया है, जहां उनके कई स्मृति चिह्न आज भी श्रद्धालुओं के आस्था से जुड़े हैं.</p>
<p>भारत में कई ऐतिहासिक गुरुद्वारे की तरह, श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब का निर्माण भी महाराजा रणजीत सिंह द्वारा करवाया गया है.</p>
<p>जत्थेदार ज्ञानी इकबाल सिंह बताते हैं कि हरिमंदिर साहिब पटना सिटी में चौक के पास झाउगंज मुहल्ले में स्थित है. कभी ये इलाका कूचा फरूख खान के नाम से जाना जाता था. अब इसे हरमंदिर गली के रूप में जाना जाता है. इसके आसपास तंग गलियों में व्यस्त बाजार है.</p>
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<div id="mainPlayerDiv-364482_1" class="zg-mainContainer">जिस समय गुरु महाराज का जन्म वर्तमान के तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब में हुआ था, उस समय पिता व नवम गुरु तेग बहादुर जी गुरु मिशन की प्रचार के लिए धुबड़ी असम की यात्रा पर गए थे.</div>
</div>
</div>
<p>श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने अपनी रचना &#8216;दशमग्रंथ&#8217; में लिखा है, &#8216;तही प्रकाश हमारा भयो, पटना शहर बिखै भव लयो&#8217;।</p>
<p>पटना हरिमंदिर साहिब में आज भी गुरु गोविंद सिंह की वह छोटी पाण है, जो बचपन में वे धारण करते थे. इसके अलावे आने वाले श्रद्धालु उस लोहे की छोटी चकरी को, जिसे गुरु बचपन में अपने केशों में धारण करते थे तथा छोटा बघनख खंजर, जो कमर-कसा में धारण करते थे, को देखना नहीं भूलते.</p>
<p>गुरु तेग बहादुर जी महाराज जिस संदल लकड़ी के खड़ाऊं पहना करते थे, उसे भी यहां रखा गया है, जो श्रद्धालुओं की श्रद्धा से जुड़ा है.</p>
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		<title>जानें, कौन से स्थान हैं शिव जी को सबसे प्रिय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:47:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वाराणसी को शिव की अत्यंत प्रिय नगरियों में से एक माना जाता है. यह उत्तर प्रदेश में स्थित है, और अपने घाटों के लिए विख्यात है. माना जाता है कि यह शिव के त्रिशूल पर विद्यमान है. भगवान शिव का अति महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग &#8220;श्री कशीविश्वनाथ&#8221; भी यहीं स्थापित है. अगर जीवन में उच्च पद प्राप्त...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>वाराणसी को शिव की अत्यंत प्रिय नगरियों में से एक माना जाता है. यह उत्तर प्रदेश में स्थित है, और अपने घाटों के लिए विख्यात है. माना जाता है कि यह शिव के त्रिशूल पर विद्यमान है. भगवान शिव का अति महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग &#8220;श्री कशीविश्वनाथ&#8221; भी यहीं स्थापित है. अगर जीवन में उच्च पद प्राप्त करना हो या सफलता चाहिए हो तो वाराणसी जाना चाहिए. काशी में गंगा स्नान करके, विश्वनाथ मंदिर में जाकर दर्शन करना चाहिए. काशी में निवास करने और शिव जी की उपासना करने से मुक्ति मोक्ष तक का वरदान मिलता है.</p>
<p><b>उज्जैन</b></p>
<p>&#8211; भारत की प्राचीन सात नगरियों में से एक प्रमुख नगरी है &#8211; उज्जैन.</p>
<p>&#8211; शिव जी का अत्यंत शक्तिशाली ज्योतिर्लिंग &#8220;महाकालेश्वर&#8221; यहीं स्थापित है.</p>
<p>&#8211; यह ज्योतिर्लिंग दक्षिणमुखी है जो अपने आप में एक दुर्लभ बात है.</p>
<p>&#8211; उज्जैन में शिवलिंग की भस्म आरती का विशेष महत्व है.</p>
<p>&#8211; उज्जैन जाकर शिव जी का दर्शन करने से आयु रक्षा होती है तथा स्वास्थ्य उत्तम होता है.</p>
<p>&#8211; उज्जैन में ही मंगलनाथ का दर्शन करके शिव पूजन करने से मंगल दोष का नाश होता है.</p>
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<div>
<p><b>सौराष्ट्र</b></p>
<p>&#8211; भगवान शिव का पहला और अति प्राचीन शिवलिंग &#8220;सोमनाथ&#8221; यहीं स्थापित है.</p>
<p>&#8211; सौराष्ट्र में ही प्रभास क्षेत्र है , जहाँ श्रीकृष्ण ने शरीर त्याग किया था.</p>
<p>&#8211; सोमनाथ के ज्योतिर्लिंग की स्थापना चन्द्र देव ने की थी.</p>
<p>&#8211; यहीं पर शिव जी की कृपा से उन्हें शाप और पीड़ा से मुक्ति मिली थी.</p>
<p>&#8211; अगर जीवन में चन्द्रमा सम्बन्धी कोई समस्या है या किसी प्रकार का कोई श्राप या दोष है, तो सौराष्ट्र में सोमनाथ का विधिवत पूजन अर्चन करना चाहिए.</p>
</div>
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		<title>हनुमानगढ़ी: जहां रामलला के दर्शन से पहले लेनी पडती है हनुमान जी की आज्ञा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:46:14 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Hindu]]></category>
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		<category><![CDATA[Ayodhya]]></category>
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		<category><![CDATA[Hanuman Garhi Mandir]]></category>
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					<description><![CDATA[अयोध्या को भगवान राम की नगरी कहा जाता है. ये मान्&#x200d;यता है कि यहां हनुमान जी सदैव वास करते हैं. इसलिए अयोध्&#x200d;या आकर भगवान राम के दर्शन से पहले भक्&#x200d;त हनुमान जी के दर्शन करते हैं. कहां है ये मंदिर  हनुमान गढ़ी, श्री हनुमान के मुख्य मंदिरो में से एक है. ये उत्तर प्रदेश की...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>अयोध्या को भगवान राम की नगरी कहा जाता है. ये मान्&#x200d;यता है कि यहां हनुमान जी सदैव वास करते हैं. इसलिए अयोध्&#x200d;या आकर भगवान राम के दर्शन से पहले भक्&#x200d;त हनुमान जी के दर्शन करते हैं.</p>
<p><b>कहां है ये मंदिर </b><br />
हनुमान गढ़ी, श्री हनुमान के मुख्य मंदिरो में से एक है. ये उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 100 किमी दूर सीतापुर जिले में अयोध्या के पास है. यहां हनुमान जी की मूर्ती बलिष्ठ और लाल रंग में है.</p>
<p><b>क्&#x200d;यों भक्&#x200d;त पहले हनुमानगढ़ी जाते हैं </b><br />
मान्यता है कि भगवान राम जब लंका जीतकर अयोध्या लौटे, तो उन्होंने अपने प्रिय भक्त हनुमान को रहने के लिए यही स्थान दिया. साथ ही यह अधिकार भी दिया कि जो भी भक्त यहां दर्शन के लिए अयोध्या आएगा, उसे पहले हनुमान का दर्शन-पूजन करना होगा.</p>
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<div id="mainPlayerDiv-364482_1" class="zg-mainContainer"><b>कैसा है ये मंदिर </b></div>
<div class="zg-mainContainer">76 सीढ़ियों का सफर तय करने पर यहां भक्त पवनपुत्र के सबसे छोटे रूप के दर्शन करते हैं. ये हनुमान टीला है, जो हनुमानगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है. यहां पवनपुत्र हनुमान की 6 इंच की प्रतिमा है, जो हमेशा फूल-मालाओं से सुशोभित रहती है. हनुमान चालीसा की चौपाइयां मंदिर की दीवारों पर सुशोभित हैं.</div>
</div>
</div>
<p><b>क्&#x200d;यों खास है ये मंदिर </b><br />
इस मंदिर में दक्षिण मुखी हनुमान जी हैं. मान्&#x200d;यता है कि यहां दर्शन करने और हनुमान जी को लाल चोला चढ़ाने से ग्रह शांत हो जाते हैं, जीवन में सफलता और समृद्धि मिलती है. यह हनुमान जी का सिद्ध पीठ है.</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>भारत समूह धर्मो का गुलदस्ता है, इसे बिखरने नहीं देगें : शाही इमाम पंजाब</title>
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		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:39:57 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Muslim]]></category>
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					<description><![CDATA[ ईद-उल-फितर के मौके पर लुधियाना जामा मस्जिद में हजारों मुसलमानों ने नमाज अदा की लुधियाना:  ईद का दिन नफरतों को मुहब्बत में बदलने का संदेश देता है। जो फिरकापरस्त ताकतें देश में नफरत की राजनीति करना चाहती हैं, उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यह बात आज यहां पंजाब के दीनी मरकज जामा मस्जिद लुधियाना में...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong> ईद-उल-फितर के मौके पर लुधियाना जामा मस्जिद में हजारों मुसलमानों ने नमाज अदा की</strong></h1>
<div>लुधियाना:  ईद का दिन नफरतों को मुहब्बत में बदलने का संदेश देता है। जो फिरकापरस्त ताकतें देश में नफरत की राजनीति करना चाहती हैं, उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। यह बात आज यहां पंजाब के दीनी मरकज जामा मस्जिद लुधियाना में ईद उल फितर के मौके पर आयोजित राज्य स्तरीय समागम के दौरान हजारों मुसलमानों को संबोधित करते हुए शाही इमाम पंजाब मौलाना हबीब उर रहमान सानी लुधियानवी ने कही। शाही इमाम ने कहा कि आज का दिन रोजा रखने वालों के लिए अल्लाह तआला की तरफ  से ईनाम है। उन्होंने कहा कि हम दुआ करते हैं कि आज का दिन दुनिया भर के लोगों के लिए अमन का संदेश लेकर आए। उन्होंने कहा कि देश की जनता की शक्ल में रह रहे करोड़ों हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित आदि एक गुलदस्ता है और इस गुलदस्ते को किसी कीमत पर बिखरने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि जामा</div>
<div>मस्जिद लुधियाना से हमेशा आपसी भाई-चारे का संदेश दिया गया है, जिसकी मिसाल आज ईद के पवित्र मौके पर यहां मौजूद सभी धर्मों के धार्मिक तथा राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की मौजूदगी है। मौलाना हबीब-उर-रहमान सानी लुधियानवी ने कहा कि इतिहास इस बात का गवाह है कि अंग्रेजों के खिलाफ देश की आजादी के लिए लड़ी गई जंग से लेकर आज तक मुसलमानों ने अपने देश के लिए बेशुमार कुर्बानियां दी हैं जिन्हें नजरांदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि आज मैं ईद के इस मुबारक मौके पर जहां पंजाब के सभी लोगों को मुबारकबाद देता हूं वहीं अल्लाह से दुआ करता हूं कि आज का दिन इस देश और हमारे राज्य के लिए रहमत और बरकत का पैगाम लेकर आए।</div>
<div> विधायक राकेश पांडे ने मुसलमानों को ईद की मुबारकबाद देते हुए कहा ईद का दिन हर एक भारतीय के लिए खुशी का दिन है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जहां हर एक धर्म का त्योहार सभी लोग आपस में मिल जुल कर मनाते हैं। श्री पांडे ने कहा कि शाही इमाम साहिब ने हमेशा ही पंजाब में अमन और खुशहाली के लिए काम किया है। उन्होंने कहा कि मैं पंजाब सरकार की ओर से अपने तमाम मुसलमान भाईयों को ईद की मुबारकबाद देता हूं।</div>
<div></div>
<div>
<figure id="attachment_856" aria-describedby="caption-attachment-856" style="width: 300px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-856" src="http://blesstvlive.com/storage/2018/06/m2-300x169.jpg" alt="" width="300" height="169" /><figcaption id="caption-attachment-856" class="wp-caption-text">ईद की नमाज़ अदा करते हुए मुस्लिम भाईचारे के लोग.</figcaption></figure>
<p>विधायक सुरिन्द्र डाबर ने मुसलमानों को ईद की मुबारकबाद देते हुए कहा कि आज का दिन हम सबके लिए बड़ी खुशी का दिन है। उन्होंने कहा कि लुधियाना शहर में सभी धर्मों के लोगों का एक गुलदस्ता है। इसके सभी फूल अपनी खुशबू के साथ माहौल को खुशगवार बना कर रखते हैं। उन्होंने कहा कि लुधियाना की यह इतिहासिक जामा मस्जिद जहां मुसलमानों का मुख्य धार्मिक केन्द्र है, वहीं यह तमाम धर्मों के लोगों के लिए अमन और मुहब्बत की निशानी है।</p>
</div>
<div>इस मौके पर मुसलमानों को ईद की मुबारकबाद देते हुए लुधियाना से जिला कांग्रेस अध्यक्ष गुरप्रीत गोगी ने कहा कि ईद का दिन सिर्फ  मुसलमान भाईयों के लिए ही नहीं बल्कि सभी भारतीयों के लिए खुशी का दिन है। गोगी ने कहा कि मैं दुआ करता हूं कि यह खुशियों भरी रीत हमेशा ऐसे ही चलती रहे।</div>
<div>इस मौके पर अकाली दल शहरी के अध्यक्ष व पूर्व विधायक रणजीत सिंह ढिल्लों ने मुसलमान भाइयों को ईद की मुबारकबाद देते हुए कहा कि इस तपती हुई गर्मी में पूरा महीना मुसलमान रोजा रखता है और अपने खुदा की इबादत करता है, जिसके बदले में अल्लाह तआला अपने बंदों को ईद का पवित्र त्योहार तोहफे के तौर पर देता है। उन्होंने कहा कि आज के दिन हर मुसलमान अपने सारे गिले शिकवे भूल कर एक दूसरे को गले लगाता है।</div>
<div>मुस्लिम भाईयों को ईद की मुबारकबाद देते हुए पूर्व जेल मंत्री जत्थे. हीरा सिंह गाबडिय़ा ने कहा कि हमें इस बात पर गर्व महसूस होता है कि भारत विश्व का एकमात्र धर्म निरपेक्ष देश है जहां सभी धर्मों के लोग आपस में मिलजुल कर हर त्योहार को बहुत खुशी से मनाते हैं। इस मौके पर हीरा सिंह गाबडिय़ा ने ऐलान किया कि आने वाली 24 जून को गुरुद्वारा फेरुमान में विशेष सम्मान किया जाएगा।</div>
<div>इस मौके पर जामा मस्जिद लुधियाना में अपने मुस्लिम भाईयों को ईद की मुबारकबाद देने के लिए गुरद्वारा दुख निवारण साहिब के अध्यक्ष प्रितपाल सिंह, दुष्यंत पांडे, पूर्व मेयर हरचरण सिंह गोहलवडिय़ा, गुलाम हसन कैसर, पार्षद परमिंदर मेहता, नायब शाही इमाम मौलाना मुहम्मद उसमान रहमानी लुधियानवी, हरभजन सिंह सोहल, सीनियर अकाली नेता बलजीत सिंह बिंद्रा, शरणजीत मिड्डा, सीनियर कांग्रेसी नेता अशोक गुप्ता,पार्षद गुरप्रीत सिंह गोपी व शाही इमाम के मुख्य सचिव मुहम्मद मुसतकीम अहरारी विशेष रूप से उपस्थित थे।</div>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वडकुनाथन: भगवान शिव के त्रिशूल पर बसा मंदिर</title>
		<link>https://blesstvlive.com/vadakkunnathan-temple/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:34:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वडकुनाथन मंदिर केरल में है। वडकुनाथन मलयाली भाषा का शब्द है। वडकुनाथन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर त्रिशूर में है। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रिशूर शहर भगवान शिव के त्रिशूल पर बसा है। त्रिशूर महाभारतकालीन शहर है। यह वही मंदिर है, जहां आदि शंकराचार्य के माता-पिता ने संतान प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किए...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वडकुनाथन</strong> मंदिर केरल में है। वडकुनाथन मलयाली भाषा का शब्द है। वडकुनाथन मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर त्रिशूर में है। पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रिशूर शहर भगवान शिव के त्रिशूल पर बसा है। त्रिशूर महाभारतकालीन शहर है। यह वही मंदिर है, जहां आदि शंकराचार्य के माता-पिता ने संतान प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किए थे। वडकुनाथन मंदिर 60 एकड़ में फैला हुआ है।</p>
<p>जहां कभी घना सागौन का जंगल हुआ करता था। भूतपूर्व कोचिन रियासत के महाराजा राम वर्मा (1790-1805) के समय में त्रिशूर रियासत की राजधानी भी रहा है। यह नगर के मध्य में ही 9 एकड़ में फैला ऊंचे परकोटे वाला एक विशाल शिव मंदिर है। इस मंदिर में हर वर्ष आनापुरम महोत्सव आयोजित किया जाता है, जिसमें हाथियों को खाना खिलाया जाता है।</p>
<p>इस महोत्सव की शुरुआत में सबसे छोटे हाथी को भोजन देकर हाथियों का भोज शुरू किया जाता है। उन्हें गुड़, घी और हल्दी के साथ मिलाए चावल खाने को दिए जाते हैं। इसके साथ ही भोजन में नारियल, ककड़ी, गन्ना आदि भी शामिल होते हैं। यहां आदि शंकराचार्य की तथाकथित समाधि भी बनी है और उसके साथ एक छोटा सा मंदिर जिसमें उनकी मूर्ति भी स्थापित है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि आदि शंकराचार्य की एक समाधि केदारनाथ मंदिर के पीछे भी है। वडकुनाथन मंदिर संरक्षण के लिए यूनेस्को का उत्कृष्टता  पुरस्कार 2015 भी मिल चुका है। यह मंदिर वर्षों पुरानी परंपराओं तथा वास्तु शास्त्र से प्राप्त संरक्षण की तकनीकों को समेटे हुए है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>इस झील में आज भी दिखाई देते है भगवान शिव के शेषनाग!</title>
		<link>https://blesstvlive.com/sheshnag-lake/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:34:02 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Hindu]]></category>
		<category><![CDATA[Religion]]></category>
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					<description><![CDATA[भारत में एक ऐसी झील स्थित है, जिसके बारे में सुन कर आपको बहुत हैरानी होगी। यह झील जम्मू और कश्मीर में अमरनाथ गुफा के समीप स्थित है। पहलगाम से इसकी दूरी करीब 32 किमी. और चंदनबाड़ी से लगभग 16 किमी. है। यह झील करीब डेढ़ किमी. की लंबाई में फैली हुई है। अमरनाथ यात्रा में...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>भारत में एक ऐसी झील स्थित है, जिसके बारे में सुन कर आपको बहुत हैरानी होगी। यह झील जम्मू और कश्मीर में अमरनाथ गुफा के समीप स्थित है। पहलगाम से इसकी दूरी करीब 32 किमी. और चंदनबाड़ी से लगभग 16 किमी. है।</p>
<p>यह झील करीब डेढ़ किमी. की लंबाई में फैली हुई है। अमरनाथ यात्रा में शेषनाग झील का धार्मिक महत्त्व है। सर्दियों में यह झील जम जाती है और यहां तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।</p>
<p>किंवदंतियों के अनुसार इस झील में शेषनाग का वास है और वे दिन में एक बार झील के बाहर दर्शन देते हैं परंतु यह दर्शन खुशनसीबों को ही प्राप्त होते हैं। कहा जाता है कि जब भोलेनाथ माता पार्वती को अमर कथा सुनाने के लिए लेकर जा रहे थे, तो उन्होंने अपने सांपों-नागों को अनंतनाग में, नंदी को पहलगाम में, चंद्रमा को चंदनबाड़ी में और शेषनाग को इस झील में छोड़ दिया था।</p>
<p>भोलेनाथ नहीं चाहते थे कि इस कथा को कोई और सुने क्योंकि कोई दूसरा इस कथा को सुन लेता, तो वह अमर हो जाता और सृष्टि का मूल सिद्धांत गड़बड़ हो जाता इसलिए भगवान शिव ने शेषनाग को झील में छोड़ दिया था। ताकि कोई इस झील को पार करके आगे न जा पाए। माना जाता है कि आज भी शेषनाग झील के पानी में दिखाई देते हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>शनि आमवस्या के प्रभाव, जानें पंडित संदीप भारद्वाज से</title>
		<link>https://blesstvlive.com/shani-amavasya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[News Bureau news]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:33:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Hindu]]></category>
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		<category><![CDATA[Pandit Sandeep Bhardwaj]]></category>
		<category><![CDATA[Shani Amavasya]]></category>
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					<description><![CDATA[शनि आमवस्या 2018 के किस राशि पर क्या पड़ेंगे प्रभाव, जानें पंडित संदीप भारद्वाज से]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>शनि आमवस्या 2018 के किस राशि पर क्या पड़ेंगे प्रभाव, जानें पंडित संदीप भारद्वाज से</p>
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		<title>इस मंदिर में शिव भोले हर साल देते हैं दर्शन &#124;</title>
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		<pubDate>Tue, 05 Oct 2021 11:31:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[﻿ यह है वो मंदिर यहाँ शिव भोले हर साल देते हैं वैसाखी से अगले शनिवार दर्शन! SHIVBADI AKA Drone Shiv Mandir (Temple) is located in village Ambota near Gagret (17 Kms away from the temple Chintapurni Mandir, Una, Himachal Pardesh. This temple is about 5000 years old. Devotees believe that Lord Shiva visit here...]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><iframe loading="lazy" src="https://www.youtube.com/embed/RIHubt80SYE" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"><span data-mce-type="bookmark" style="display: inline-block; width: 0px; overflow: hidden; line-height: 0;" class="mce_SELRES_start">﻿</span></iframe></p>
<p>यह है वो मंदिर यहाँ शिव भोले हर साल देते हैं वैसाखी से अगले शनिवार दर्शन!</p>
<p><strong>SHIVBADI AKA Drone Shiv Mandir</strong> (Temple) is located in village Ambota near Gagret (17 Kms away from the temple Chintapurni Mandir, Una, Himachal Pardesh.</p>
<p>This temple is about 5000 years old. Devotees believe that Lord Shiva visit here every year. The temple is said to have a rich history behind from the times of Guru Drone (Drona or Dronacharya).</p>
<p>The temple and the dense forest of special spiral branch trees around. It is once said to be the Drone Nagri (VILLAGE OF DRONACHARYA). He was the Guru of royal families, Pandavas and Kauravas.</p>
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