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बारिश का मौसम, बीमारियां और उनसे बचाव

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही अनेक बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ जाया करता है। मौसम के असर से होने वाली मौसमी बीमारियां कभी-कभी अत्यधिक कष्टकर एवं प्राणलेवा भी साबित होने लगती हैं। इस ऋतु में उत्पन्न बीमारियों को कुछ घरेलू उपायों से न सिर्फ आने से ही रोका जा सकता है बल्कि उन्हें पूर्ण रूप से ठीक भी किया जा सकता है।

बदहजमी:- यह रोग वर्षा ऋतु का प्रमुख रोग है जिसमें खाया-पीया ठीक से नहीं पचता, पेट भारी-भारी लगता रहता है और उसमें पीड़ा होती रहती है। आवश्यकता से अधिक खाने और रात में देर से खाने की आदतों के कारण यह बीमारी हो जाती है।

काली मिर्च, छोटी पीपल, को समान भाग में लेकर कूट-पीसकर महीन चूर्ण बनाकर रख लें एवं भोजन करने के बाद एक चम्मच खाकर ऊपर से पानी पी लें।

काली मिर्च, काला नमक, हल्दी सबको समान मात्र में लेकर चूर्ण बनाकर रख लें। भोजन के बाद 2 ग्राम चूर्ण दोनों समय गुनगुने पानी से फांक लें।

डायरिया:- खान-पान की अनियमितता, अस्वच्छ जल के सेवन आदि से यह रोग हो जाता है। इस रोग के कारण पतले दस्त बार-बार होने लगते हैं। आमतौर पर बच्चे के जन्म से पांच वर्ष की आयु से दस वर्ष के आयु तक यह रोग अधिक होता है। इस रोग में दस्त के साथ शरीर का पानी बहुत अधिक मात्र में निकल जाता है। इस निर्जलीकरण के कारण रोगी की जान तक जा सकती है। डायरिया के प्रारंभ होते ही निम्न उपचार करने चाहिए।

दस्त शुरू होते ही सोंठ, पीपर, धनिया, बड़ी हर्रे और अजवायन को समान मात्र में लेकर पीसकर पिला दें। मात्रा – एक चाय चम्मच।
इलेक्ट्रोल पाउडर का घोल हर दस मिनट बाद पिलाते रहें। भयंकरता की स्थिति में चिकित्सक के समीप अविलम्ब ले जायें।

पीलिया:-  बाइलीरूबिन नामक पदार्थ के रक्त में सामान्य से अधिक हो जाने पर पीलिया (जॉन्डिस) रोग हो जाता है। फलस्वरूप त्वचा, नाखून, पेशाब, मुंह आदि पर पीलापन दिखायी देने लगता है। इस रोग से पाचन शक्ति खराब हो जाती है, मुंह का स्वाद खराब हो जाता है, भूख नहीं लगती और मल दुर्गन्धयुक्त हो जाता है।

एक बतासे में कच्चे पपीते के रस की दस बूंदें डालकर प्रतिदिन प्रात: काल 10-15 दिनों तक खाते रहने से यह रोग शांत हो जाता है। खान-पान पर ध्यान रखना आवश्यक है।

शक्कर 50 ग्राम के साथ कलमी शोरा दस ग्राम मिलाकर उसकी बीस पुड़िया बनाकर रख लीजिए। प्रतिदिन तीन पुड़िया (सुबह, दोपहर और शाम एक-एक) लेकर उसमें थोड़ा दही और भुना जीरा आधा चम्मच मिलाकर सेवन करते रहने से पीलिया शांत हो जाता है।

पेचिश:- इसमें दस्त अधिक मात्रा में नहीं होता परन्तु बार-बार शौच जाने की शंका बनी रहती है। दस्त के साथ चिकनाई (आंव) भी निकलता रहता है और पेट तथा गुदा में ऐंठन होती रहती है। रोगी बेचैन हो उठता है।

अधपके बेल के गूदे को पानी में उबालकर छान लें और उसमें शहद मिलाकर रोगी को पिलायें।
दो पके हुए केले लेकर इनके गूदे को गुड़, नमक या दही के साथ मिलाकर खाने से पेचिश की बीमारी शर्तिया ठीक हो जाती है।

आई फ्लू:- गर्मी तथा बरसात के मौसम में होने वाली संक्रामक बीमारियों में आइफ्लू अर्थात् आंखों का उठना प्रमुख माना जाता है। इसमें आंख के कंजक्टिवा में सूजन होने के साथ ही आंखें लाल-लाल हो जाती हैं। आंखों में कीचड़ बहुत आने लगती है। यह बीमारी संक्रामक होती है अत: दूसरे तक शीघ्र ही फैल जाती है।

हरड़ को मोटा-मोटा कूटकर पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर उसमें आंखों को धोने से आराम मिलता है।
बबूल के ताजा पत्तों को पीसकर टिकिया बनाकर आंखों पर रखकर सो जाने से लाभ मिलता है। गुलाब जल को नियमित रूप से आंखों में डालना चाहिए।

त्वचा रोग:- बरसात के दिनों में नमी तथा दूषित पानी की वजह से त्वचा रोग होने की संभावना काफी बढ़ जाती है जिसमें खुजली, घम्हौरियां, जुड़पित्ती आदि प्रमुख होते हैं। इस मौसम में नीमयुक्त साबुन, नायसिल पाउडर, आदि का प्रयोग करके तथा भीगे हुए वस्त्रों को अधिक देर तक न पहनकर त्वचा रोगों से बचा जा सकता है। बरसात के सभी होने वाले संभावित रोगों से बचे रहने के लिए खान-पान तथा सफाई पर पूरा ध्यान देना चाहिए। फल-सब्जियां देखकर ही खरीदें तथा हरी पत्तेदार सब्जियों का विशेष ध्यान रखें।

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